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द एलिफैंट व्हिस्परर्स: ऑस्कर से सम्मानित फिल्म में हाथियों का आदिवासी कनेक्शन

Posted on March 13, 2023 - 5:36 pm by

नेहा बेदिया, ट्राइबल खबर के लिए

ऑस्कर के 95 साल के सफर में पहली बार किसी भारतीय शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री को ‘बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का अवार्ड मिला है. यह डॉक्यूमेंट्री है ‘द एलिफैंट व्हिस्परर्स’. यह फिल्म आदिवासी जीवन में हाथियों की अहमियत और उनसे परस्पर संबंध की सच्ची कहानी है. इस कहानी में एक आदिवासी कपल है, जो हाथी के एक अनाथ बच्चे को अपने बच्चे की तरह पालता है. इस फिल्म के माध्यम से उस पूरे समुदाय को प्रकाश में लाया गया है, जो न सिर्फ हाथियों को बल्कि जंगल को भी समझते हैं.

“द एलिफैंट व्हिस्परर्स” एक इंडियन अमेरिकन तमिल डॉक्यूमेंट्री फिल्म, जिसने अकेडमी अवार्ड्स 2023 में कमाल कर दिखाया है. इस फिल्म को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री शोर्ट फिल्म के लिए ऑस्कर से सम्मानित किया गया है.

फिल्म की खास बात यह है कि इसमें कट्टुनायकन समाज के दो बुजुर्ग आदिवासियों का हाथियों के प्रति स्नेह और लगाव के साथ उनके संस्कृति और परंपरा को बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है. पूरा फिल्म प्राकृतिक परिदृश्य से परिपूर्ण है जो फिल्म को सौंदर्य विषयक का पात्र भी बनाता है. बता दें कि यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है.

डायरेक्टर कार्तिकी गोंजाल्विस की यह पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म है, जिसके लिए उन्होंने पांच साल तक एक ऐसे आदिवासी परिवार का अनुसरण किया जो हाथियों के साथ रह रहा है. इसमें दो बुजुर्ग आदिवासी बोम्मन और बेली के एक हाथी के बच्चे जिसका नाम रघु है उसके साथ उनके प्यार और जुड़ाव को दिखाया गया है.

सिख्या इंटरटेनमेंट द्वारा प्रोड्यूस किए गए इस फिल्म की वर्ल्ड प्रीमियर 9 नवंबर 2022 को न्यू योर्क सिटी के डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल में की गई थी जिसे दुनिया का सबसे बड़ा डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्लेटफोर्म माना जाता है.

कट्टुनायकन आदिवासी जोड़े का हाथी से संबंध के ऊपर बनी यह फिल्म दिल को छू लेने वाली है. तो आखिर इस फिल्म में क्या है इसके बारे हम थोड़ी सी जानकारी आपको देते हैं… कट्टुनायकन बोम्मन और बेली तमिलनाडु के थेप्पाकाडु एलिफेंट कैंप जो की मुदुमलै टाइगर रिजर्व के अंतरगत आता है, वहां के निवासी हैं. उन्होंने पहली बार एक तीन महीने के एक हाथी के बच्चे यानि रघु को बचाया था, जिसकी मां की मृत्यु करंट लगने से हो गई थी और रघु अपने झुंड से भी अलग हो गया था. रघु बोम्मन को बहुत बुरी

और जख्मी स्थिति में मिला था. रघु के जीवित रहने की संभावना बहुत कम थी. इलाके के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों को यह एहसास हुआ कि वे रघु को उसकी बुरी परिस्थिति से निकाल नहीं सकते हैं तो उन्होंने उसे बोम्मन और बेली को सौंप दिया था.

चुंकि बोम्मन और बेली आदिवासी समाज से ताल्लुख रखते हैं, जिन्हें जंगल और जंगल के जानवरों के साथ कैसे सदभाव में रहना है बखूबी मालूम है. उन्होंने रघु को अपने बच्चे की तरह पालने लगा और उसे बचाने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया. परिणामस्वरूप आदिवासी रख रखाव और जीवनशैली से रघु को बचाने में वे कामयाब रहे और उसे स्नेह और प्यार से बेटे के समान मानने लगे.

बोम्मन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के लिए काम करते हैं और बेली को भी आधिकारिक तौर पर उनके साथ हाथी के बच्चों का ख्याल रखने के लिए काम पर रखा गया है. वे इलाके की एकमात्र महिला हैं जिन्हें यह काम मिला है.

वहीं आदिवासी बोम्मन और बेली को फॉरेस्ट ऑफिसर्स के द्वारा कुछ समय के बाद रघु की तरह एक और हाथि के बच्चे को पालने की जिम्मेदारी सौंपी गई. जिसका नाम अम्मू रखा गया है. वे रघु और अम्मू को परिवार का हिस्सा मान कर जीवन बिता रहे थे कि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के द्वारा रघु को उन्हें सौंपने के लिए कहा गया. रघु से बिछड़ने का दुख बोम्मन और बेली ने महसूस किया कि जैसे उनके अपने बेटे से अलग होना पड़ रहा हो. हालांकि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट रघु को ले गए लेकिन जब भी उससे मुलाकात होती है, बोम्मन के पुकारने पर रघु दौड़ा चला आता है. यह उनका प्यार ही है जो कभी खत्म नहीं हो सकता.

अपने आदिवासियत के बारे में बेली बताती हैं कि मैं आदिवासी समाज की औरत हूं और हमारे लोग जंगल के बीच रहते हैं. हम कट्टुकायनों के लिए जंगल का हित सबसे ऊपर है. हम जंगल में नंगे पैर चलते हैं, ये हमारा जंगल को सम्मान दिखाने का तरीका है.

वहीं बोम्मन बतातें हैं कि उनके समाज के लिए हाथियों को देखना, भगवान को देखने जैसा है. वे हाथियों को भगवान मानते हैं और पूरे सम्मान से पूजते भी हैं.

द एलिफेंट विस्परर्स फिल्म में कट्टुनायकन आदिवासी बोम्मन और बेली के बारे बताया गया है. इसलिए ये जानना जरूरी हो जाता है कि कट्टुनायकन आदिवासी कौन हैं..

दरअसल, तमिलनाडु की कुल जनसंख्या 7.21 करोड़ है, उनमें से आदिवासियों की संख्या महज 7.21 लाख है, जो कि कुल जनसंख्या का 1.10 फीसदी है. तमिलनाडु में कुल 36 आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल किया गया है. इसमें से छह आदिवासियों को कमजोर जनजातियों यानि PVTGs की श्रेणी में रखा गया है. इन्हीं में से एक आदिवासी समुदाय कट्टुनायकन भी है. कट्टुनायकन के अलावा बाकी सभी कमजोर आदिवासी समुदाय विलुप्त होने की कगार पर है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कट्टुनायकन की जनसंख्या 45,227 है.

बता दें कि कट्टुनायकन आदिवासी जीवन यापन करने के लिए शिकार करते है या वनोपज को एकत्र करते हैं. इन आदिवासियों के बारें में धारणा है कि वे शायद ही कभी अन्य आदिवासियों से घुलते मिलते हैं. इसके साथ ही आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण टोन-टोटका के सहारे अपना इलाज कराने के लिए मजबूर हैं. कट्टुनायकन आदिवासी द्रविड़ भाषाओं के मिश्रण वाली भाषा का प्रयोग करते हैं. इसके अलावा कट्टुनायकन शहद संग्रह में अपनी विशेषता के लिए भी जाने जाते हैं.

द एलिफेंट व्हिस्परर्स का एक स्याह पक्ष यह भी है, जहां हमें ये देखने को मिल रहा है कि इतने बड़े मंच पर जब इस फिल्म के लिए ऑस्कर दी गई तब फिल्म के मुख्य किरदार जो आदिवासी हैं, उनका कहीं कोई जिक्र नहीं किया गया. पूरी फिल्म इनके इर्द-गिर्द रही पर अकैडमी अवार्ड के मंच पर ऑस्कर लेने से लेकर बाद के इंटरव्यूज के स्पीच में भी फिल्म के निर्माताओं के द्वारा आदिवासी कपल बोम्मन और बेली का नाम कहीं सुनने को नहीं मिला.

वहीं इस बारे में जाने माने वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सिंह मंडल कहते हैं, “जब स्टेज पर चढ़कर ऑस्कर लेने के बारी आई तो फ़िल्म के दोनों, मदुमलै जंगल के, आदिवासी किरदार, जिनका वास्तविक जीवन ही ये डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है, सीन से ग़ायब हो गए. ये उस मंदिर या मूर्ति की तरह है, जिन्हें बनाता कोई है, छेनी और हथौड़ा किसी और का चलता है, पसीना किसी और का गिरता है और प्राण प्रतिष्ठा का प्रपंच करके कोई और उसका स्वामी बन जाता है.

बनाने वाले की अक्सर गर्भ गृह में एंट्री बैन हो जाती है. इतिहास से लेकर वर्तमान तक के सारे निर्माण, सारे नृत्य, डांस, कलाकारी जिनकी है, उनका इतिहास में नाम लेवा नहीं होता. देवदासियों का सादिर अट्टम सौ साल से कम समय में भरत नाट्यम बन गया और इसमें पैसा और नाम आते है देवदासियों को धकेलकर बाहर कर दिया गया. कितना निष्ठुर और निर्मम है ये सब.”

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