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आजाद भारत के पहले फुटबॉल कप्तान एक आदिवासी, जानिये कौन थे वो

Posted on January 28, 2023 - 3:29 pm by

विजय उरांव, ट्राइबल खबर के लिए

आदिवासियों के इतिहास के बारे में बहुत कुछ लिखा जाना बाकि है. हर दिन चौंकाने और गर्व करनेवाली जानकारी सामने आ रही है. हम आपको बताने जा रहे हैं भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान के बारे में. आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि वो कोई और नहीं, बल्कि एक आदिवासी थे. नाम बताने से पहले उनके कारनामा बताना जरूरी है.

सन 1948 में फ्रांस के साथ मैच था. मैच में भारतीय टीम हार गयी थी, लेकिन उनकी कही एक बात खुब चर्चा में रही. मैच के बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे पूछा गया कि आपकी टीम के खिलाड़ी नंगे पैर क्यों खेलते हैं? इस पर उन्होंने ने जवाब दिया, हम फुटबॉल(पैर से बॉल के साथ खेलना) खेलते हैं, आप बूटबॉल(जूते के साथ खेलना) खेलते हैं. नाम था तालीमेरेन एओ.

डॉ. तालीमेरेन एओ ने लंदन 1948 ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ भारत की कप्तानी की. देश की आजादी के बाद भारतीय फुटबॉल टीम का पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेला था. हालांकि, पीके बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, तुलसीदास बलराम, सैलेन मन्ना या आईएम विजयन, बाईचुंग भूटिया और सुनील छेत्री जैसे आधुनिक महान खिलाड़ियों की लीग में कोई घरेलू नाम नहीं है.

तालीमेरेन का जन्म ब्रिटिश भारत में असम के नागा हिल्स जिला(वर्तमान मोकोकचुंग जिला, नागालैंड) के चांगकी गांव में 28 जनवरी 1918 को हुआ था. वे भारतीय फुटबॉलर होने के साथ नागालैंड के डॉक्टर भी थे. उनके पिता और माता का नाम रेवरेंड सुबोंगवती निंगडांगरी एओ और मांगसांगला चांगकिलारी था. तालीमेरेन के 12 भाई बहन थे. तालीमेरेन के जन्म के कुछ सालों बाद ही टायफाइड के कारण उनके पिता की मौत हो गई.

एओ ने इम्पुर क्रिश्चियन स्कूल में पढ़ाई की और स्कूल टीम के कप्तान थे. 1937 में टीम के साथ टूर्नामेंट जीतने के बाद उन्हें ऑल असम इंटर स्कूल फुटबॉल चैंपियनशिप के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर के रूप में नामित किया गया था. बाद में उन्होंने जोरहाट क्रिश्चियन मिशन स्कूल में प्रवेश लिया और इसके फुटबॉल रीम की कप्तानी भी की.

(तालीमेरेन)बांए से पहले/FIFA(twitter)

भारत का पहले फुटबॉल कप्तान

तालीमेरेन के पिता की आखिरी इच्छा थी कि उनका बेटा डॉक्टर बने. पिता का सपना पूरा करने के लिए वह कारमाइकल मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई करने लगे. इसी के दौरान वह असम के महाराजा क्लब में फुटबॉल खेलने लगे फिर 1943 में मोहन बागान का हिस्सा बने. महज एक साल के अंदर कप्तान बन गए, उसके डिफेंस के कारण उन्हें ग्रेट वॉल ऑफ चाइना कहा जाने लगा. उनके इसी प्रदर्शन के बाद उन्हें 1948 के ओलिंपिक के लिए फुटबॉल कप्तान चुना गया. वह एक असाधारण वॉलीबॉल खिलाड़ी भी थे, लेकिन यह फुटबॉल में ही उनको पहचान मिली.

स्कूल में  वह एथलेटिक्स में इतनी सारी ट्राफियां और पदक जीतते थे कि उन्हें पहाड़ी में चढ़कर अपने घर तक ले जाना जाना भी मुश्किल होता था. जिसके कारण तालीमेरेन एओ अपनी ट्राफियां दोस्तों के बीच बांटते थे और केवल अपने मेडल और सर्टिफिकेट घर ले जाते थे.

तालीमेरेन न सिर्फ टीम के कप्तान थे बल्कि खेलों में भारत के ध्वजवाहक भी थे. भारत ने एक स्वतंत्र देश के तौर पर अपना पहला फुटबॉल मैच तालीमेरेन की कप्तानी में खेला. भारत के अधिकतर खिलाड़ी नंगे पैर इस मैच में उतरे थे. भारत मैच जीतने के करीब था लेकिन आखिरी मिनट में फ्रांस ने एक गोल के साथ खुद को बचा लिया.

1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम की तस्वीर डॉ. तालीमेरेन एओ(कप्तान) बाएं से तीसरे (बैठे)/ olympics.com

मैच के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालीमेरेन से पूछा गया कि आपके टीम के खिलाड़ी नंगे पैर क्यों खेलते हैं. इस पर भारतीय टीम ने जवाब देते हुए कहा था, हम फुटबॉल(पैर से बॉल के साथ खेलना) खेलते हैं, आप बूटबॉल(जूते के साथ खेलना) खेलते हैं

ठुकरा दिया था इंग्लैंड के आर्सेनल का ऑफर

उनके इस बयान से उन्होंने कई पत्रकारों का ध्यान आकर्षित किया, खासतौर पर ब्रिटिश पत्रकारों का. यही कारण रहा कि मैच के बाद इंग्लैंड की राजकुमारी और महारानी एलिजाबेथ की छोटी बहन माग्रेट ने टीम को बकिंघम पैलेस बुलाया. इस दौराना टीम के खिलाड़ियों ने किंग जॉर्ज V और महारानी से मुलाकात की.

तब के कई मीडिया रिपोर्टस में कहा गया था कि तालीमेरेन को इंग्लैंड के क्लब आर्सेनल ने कॉन्ट्रैक्ट साइन करने का ऑफर दिया था. हालांकि तालीमेरेन ने इसे मना कर दिया था क्योंकि वह भारत में ही रहना चाहते थे. ओलिंपिक के बाद भारतीय टीम ने इंग्लैंड, नैदरलैंड्स, वेल्स और आयरलैंड में एग्जीबिशन मैच खेले. इस दौरान उन्होंने डच के बड़े क्लब एजेक्स को 5-2 से हराया था.

जिंदगी की दूसरी पारी

1950 में तालीमेरेन एओ ने रिटायरमेंट के बाद फैसला किया कि वह अपने पिता का सपना पूरा करेंगे. उन्होंने अपनी एमबीबीएस की ड्रिग्री पूरी की. इसके बाद वह डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज के ईएनटी डिपार्टमेंट में काम करने लगे. 1953 में उन्हें कोहिमा सिविल हॉस्पिटल में मेडिकल सुपरिटेंडेट बनाया गया. लगभग 10 साल बाद प्रदेश की हेल्थ सर्विस के पहले नागा डायरेक्टर बने. वह 1978 तक इस पद पर रहे. उन्होंने अपनी दूसरी पारी में भी वही निष्ठा दिखाई जो एक खिलाड़ी के तौर पर. डॉक्टर बनने के बाद भी खेल उनसे दूर नहीं हुआ. उनके बेटे टेलीमेरेन जूनियर ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘पिता जी खेल के दौरान हमें अपना बच्चा नहीं विरोधी समझते हैं. चाहे बैडमिंटन कोर्ट हो या फुटबॉल का मैदान वह सिर्फ हमें हराने चाहते हैं.

तालीमेरेन की मृत्यु 80 वर्ष की आयु में 13 सितंबर 1998 में हो गई.

(मुख्य फोटो: The Hindu)

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