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राजस्थान: इतिहास का पन्ना-पन्ना आदिवासी वीरता से भरा पड़ा है: मोदी

Posted on November 1, 2022 - 5:03 pm by

गोविंद गुरु जैसे महान स्वतन्त्रता सेनानी भारत की परम्पराओं व आदर्शों के प्रतिनिधि थे. वो किसी रियासत के राजा नहीं थे. लेकिन फिर भी वो लाखों आदिवासियों के नायक थे. अपने जीवन में उन्होंने अपना परिवार खो दिया, लेकिन हौसला कभी नहीं खोया. उन्होंने हर आदिवासी को गोविंद गुरु ने अगर आदिवासी समाज के शोषण के खिलाफ अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष का बिगुल फूंका. साथ ही अपने समाज की बुराइयों के खिलाफ भी उन्होंने लड़ाई लड़ी थी. वो एक समाज सुधारक भी थे. वो एक आध्यात्मिक गुरु भी थे. वो एक संत भी थे. वो एक लोक-नेता भी थे. उक्त बातें पीएम मोदी ने मानगढ़ गौरव गाथा के कार्यक्रम के दौरान कही. पीएम मोदी 1 नवंबर को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ धाम पहुंचे थे.

पीएम ने आगे कहा कि उनके जीवन में हमें साहस, शौर्य के जितने महान दर्शन होते हैं. उतना ही ऊंचा उनका दार्शनिक और बौद्धिक चिंतन भी था. गोविंद गुरु का वो चिंतन, वो बोध आज भी उनकी ‘धूणी’ के रूप में मानगढ़ धाम में अखंड रूप से प्रदीप्त हो रहा है. उनकी ‘संप सभा’ देखिए शब्द भी कितना मार्मिक है. ‘संप सभा’ समाज के हर तबके में संप भाव पैदा हो.  इसलिए उनके ‘संप सभा’ के आदर्श आज भी एकजुटता, प्रेम और भाईचारा की प्रेरणा दे रहे हैं. उनके अनुयायी आज भी भारत की आध्यात्मिकता को आगे बढ़ा रहे हैं.

ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता की पराकाष्ठा

17 नवम्बर 1913 को मानगढ़ में जो नरसंहार हुआ, वो अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता की पराकाष्ठा थी. एक ओर आज़ादी में निष्ठा रखने वाले भोलेभाले आदिवासी तो दूसरी ओर दुनिया को गुलाम बनाने की सोच. मानगढ़ की इस पहाड़ी पर अंग्रेजी हुकूमत ने डेढ़ हजार से ज्यादा युवाओं,  बुजुर्गों,  महिलाओं को घेरकर के उन्हें मौत के घाट उतार दिया. एक साथ डेढ़ हजार से ज्यादा लोगों की जघन्य हत्या करने का पाप किया गया. दुर्भाग्य से आदिवासी समाज के इस संघर्ष और बलिदान को आज़ादी के बाद लिखे गए इतिहास में जो जगह मिलनी चाहिए थी,  वो नहीं मिली. आज़ादी के अमृत महोत्सव में आज देश उस कमी को पूरा कर रहा है.

इतिहास का पन्ना-पन्ना आदिवासी वीरता से भरा पड़ा है

भारत का अतीत, भारत का इतिहास,  भारत का वर्तमान और भारत का भविष्य आदिवासी समाज के बिना पूरा नहीं होता. हमारी आजादी की लड़ाई का भी पग-पग,  इतिहास का पन्ना-पन्ना आदिवासी वीरता से भरा पड़ा है. 1857 की क्रांति से भी पहले,  विदेशी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समाज ने संग्राम का बिगुल फूंका थे. 1857 से भी पहले 1780 में संथाल में तिलका मांझी के नेतृत्व में ‘दामिन सत्याग्रह’ लड़ा गया था. ‘दामिन संग्राम’ लड़ा गया था. 1830-32 में बुधू भगत के नेतृत्व में देश ‘लरका आंदोलन’ का गवाह बना. 1855 में आजादी की यहीं ज्वाला ‘सिधु कान्हू क्रांति’ के रूप में जल उठी. इसी तरह से  भगवान बिरसा मुंडा ने लाखों आदिवासियों में क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित की. वो बहुत कम आयु में चले गए. लेकिन जो उनकी ऊर्जा, उनकी देशभक्ति और उनका हौसला ‘ताना भगत आंदोलन’ जैसी क्रांतियों का आधार बना.

गुलामी के शुरुआती सदियों से लेकर 20वीं सदी तक आप ऐसा कोई भी कालखंड नहीं देखेंगे, जब आदिवासी समाज ने स्वाधीनता संग्राम की मशाल को थामे न रखा हो. आंध्र प्रदेश में ‘अल्लूरी सीताराम राम राजू गारू’ के नेतृत्व में आदिवासी समाज ने ‘रम्पा क्रांति’ को एक नई धार दे दी थी. और राजस्थान की ये धरती तो उससे भी बहुत पहले ही आदिवासी समाज की देशभक्ति की गवाह रही है. इसी धरती पर हमारे आदिवासी भाई-बहन महाराणा प्रताप के साथ उनकी ताकत बनकर खड़े हुऐ थे. हम आदिवासी समाज के बलिदानों के ऋणी हैं. हम उनके योगदानों के ऋणी हैं. इस समाज के, इस प्रकृति से लेकर पर्यावरण तक, संस्कृति से लेकर परम्पराओं तक, भारत के चरित्र को सहेजा और सँजोया है.

15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाएगा

15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर देश ‘जन-जातीय गौरव दिवस’ मनाएगा. आदिवासी समाज के अतीत और इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आज देश भर में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित विशेष म्यूज़ियम बनाए जा रहे हैं. जिस भव्य विरासत से हमारी पीढ़ियाँ वंचित रह रहीं थीं.  वो अब उनके चिंतन का,  उनकी सोच का और उनकी प्रेरणाओं का हिस्सा बनेगी.

इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र भाई पटेल भी मौजूद रहे. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में जनजातीय गौरव दिवस का जिक्र किया था.

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