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ST सूची में समुदायों को शामिल करने की वर्तमान प्रक्रिया पर्याप्त – जनजातीय कार्य मंत्रालय

Posted on March 16, 2023 - 3:39 pm by

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ST सूची में समुदायों को शामिल करने की वर्तमान प्रक्रिया को प्रयाप्त बताया है. दरअसल राज्यसभा के एक सवाल को लेकर जनजातीय कार्य मंत्रालय जवाब दे रहा था, जिसमें ST सूची में शामिल करने के लिए मानदंड और प्रक्रिया में संशोधन की आवश्यकता के बारे में चिंता जताई गई थी.

वर्ष 1999 में पहली बार शामिल किए जाने के तौर-तरीकों के अनुसार समुदाय को ST सूची में शामिल करने का प्रस्ताव संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश सरकार से शुरू होता है. इसके बाद प्रस्ताव केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय को भेजा जाता है, जो इसे भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय में भेजता है. यदि रजिस्ट्रार जनरल समावेशन को मंजूरी देता है, तो प्रस्ताव राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) को भेजा जाता है.

इन संस्थाओं की सहमति के बाद ही संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में उपयुक्त संशोधन लाने के लिए कैबिनेट के पास प्रस्ताव भेजा जाता है.

बीजू जनता दल के सांसद मुजीबुल्ला खान के एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा, ”ये तौर-तरीके किसी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की अनुसूचित जनजातियों की सूची में समुदायों को शामिल करने के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए पर्याप्त हैं.”

ST सूची में शामिल करने के मानदंड

लोकुर समिति द्वारा 1965 में तय किए गए मानदंडों के अनुसार यह तय किया जाता है कि किसी समुदाय को एसटी सूची में शामिल किया जा सकता है या नहीं. इन मानदंडों में शामिल हैं: आदिम लक्षणों के संकेत, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क करने में शर्म, और पिछड़ापन.

फरवरी 2014 में गठित एक आंतरिक सरकारी टास्क फोर्स द्वारा “अप्रचलित”(Obsolete), “कृपालु”(Condescending), “हठधर्मिता”(Dogmatic) और “कठोर”(Rigid) होने के लिए समुदायों को शामिल करने की प्रक्रिया और मानदंड दोनों की कड़ी आलोचना की गई थी. तत्कालीन जनजातीय मामलों के सचिव हृषिकेश पांडा के नेतृत्व वाली समिति ने भी कहा था कि जिस प्रक्रिया का पालन किया जा रहा था, वह “बोझिल” थी और “सकारात्मक कार्रवाई और समावेशन के संवैधानिक एजेंडे को हरा देती है”. टास्क फोर्स ने निष्कर्ष निकाला था कि इन मानदंडों और प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप देश भर में लगभग 40 समुदायों को शामिल करने में देरी हुई या शामिल नहीं किया गया.

इस टास्क फोर्स की रिपोर्ट के आधार पर पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल ने 2014 में प्रक्रिया और मानदंडों को बदलने के लिए एक मसौदा कैबिनेट नोट पेश किया था. हालाँकि, लगभग आठ वर्षों तक पाइपलाइन में रहने के बाद, प्रस्ताव को रोक दिया गया था.

तब से जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने संसद में जोर देकर कहा कि लोकुर समिति द्वारा निर्धारित मानदंड उचित थे और जनजातीय समाज नहीं बदलते हैं.

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