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तीन आदिवासी साहित्यकारों को मिला प्रथम जयपाल-जुलियस-हन्ना साहित्य पुरस्कार

Posted on November 7, 2022 - 4:15 pm by

पुरस्कार समारोह सह बहुभाषाई आदिवासी-देसज काव्यपाठ का आयोजन 6 नवंबर को रांची प्रेस क्लब में किया गया. यह आयोजन यूके स्थित एएचआरसी रिसर्च नेटवर्क लंदन, टाटा स्टील फांउंडेशन के सहयोग से झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा ने किया.

प्रथम जयपाल-जुलियस-हन्ना साहित्य पुरस्कार तीन आदिवासी साहित्यकारों को दिया गया. इनमें अरूणाचल प्रदेश के तांग्सा आदिवासी समुदाय के रेमोन लोंग्कू (कोंग्कोंग-फांगफांग), महाराष्ट्र के भील आदिवासी समुदाय के सुनिल गायकवाड़ (डकैत भील सिंह के बच्चे) और दिल्ली की उरांव आदिवासी कवयित्री उज्ज्वला ज्योति तिग्गा (मरणोपरांत) शामिल है.

मुख्य अतिथि जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ गोजरी आदिवासी साहित्यकार जान मुहम्मद हकीम ने कहा कि अपने पुरखों को याद कर उन्हें तारीख (इतिहास) के पन्नों में रखना हमारा फर्ज है. वे जम्मू-कश्मीर के गुर्जर बकरवाल आदिवासी समुदाय से संबंध रखते हैं. गुर्जर बकरवाल समुदाय के लोग वहां के हर जिले में हैं. देश के अन्य आदिवासियों की तरह ही उनकी भी परिस्थितियां हैं. गोजरी भाषा जम्मू-कश्मीर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोलियों में तीसरे स्थान पर है. इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में किया जाये. वहां साहित्य के क्षेत्र में काफी काम हो रहा है.

वहीं रेमोंन लोंग्कू ने कहा कि उन्हें यहां बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला है. उन्होंने कृषि कार्य के समय गाया जाने वाला गीत “साइलो साइलाई असाइलाई चाई…” (चलो गीत गाते हैं गीत) सुनाया.

इसके अलावा सुनिल गायकवाड़ ने कहा कि अंग्रेजों के जमाने में महाराष्ट्र में आदिवासी क्रांतिकारियों को तब की व्यवस्था डकैत कहती थी. “डकैत देव सिंह भील के बच्चे” उनके दादा की कहानी है.

डॉ अनुज लुगुन ने कहा कि आदिवासी साहित्य जैविक व देशज स्वर के साथ अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को विस्तार दे रहा है. आदिवासी साहित्य की अभिव्यक्ति व्यक्तिक्त नहीं है. बल्कि यह सामूहिक समुदाय संवेदनाओं को आलोचनात्मक रूप से भी अभिव्यक्त कर रही है. मौके पर सुंदर मनोज हेम्ब्रम व डॉ सावित्री बड़ाईक ने भी अपनी बात रखी. बहुभाषाई काव्यपाठ भी हुआ. आयोजन में साहित्य संस्कृति की अध्यक्ष ग्लोरिया सोरेंग, महासचिव वंदना टेटे, अश्विनी कुमार पंकज आदि ने अहम भूमिका निभायी.

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