Skip to main content

आदिवासी महिलाएं बना रही है इको-फ्रेंडली टी कप, पीएम भी कर चुके हैं तारिफ

Posted on November 1, 2022 - 1:35 pm by

नेहा बेदिया, ट्राईबल खबर के लिए

तमिलनाडु में कोयंबटूर जिले के अनाईकट्टी की आदिवासी महिलाओं ने इको फ्रेंडली कप का निर्माण किया है. ये आदिवासी महिलाएं ‘दया सेवा सदन’  नाम के एक चैरिटी संगठन में काम करती हैं. इसके अलावा वहां बड़ी मात्रा में मिट्टी के बर्तनों बनाकर देश-विदेश तक निर्यात कर रही हैं.

 टी कप के अलावा भी बहुत कुछ है

दया सेवा सदन संगठन में केवल टेराकोटा चाय के कप नहीं,  बल्कि प्लेट,  हाथ से बुने हुए आसन, हर्बल शहद और जैम का निर्माण और बिक्री किया जाता है. संगठन से जुड़ी ये आदिवासी महिलाएं पानापल्ली और कोंडनूर गांवों में रहती हैं. संगठन का संचालन सुंदरराजन नामक व्यक्ति द्वारा की जाती है. इसकी शुरूआत 2012 में हुई थी.

सुंदर राजन के अनुसार आदिवासी लोगों की आजीविका में सुधार के लिए विभिन्न हस्तशिल्प बनाया जा रहा हैं. इस केंद्र में 30 से अधिक आदिवासी महिलाएं आजीविका के रूप में कार्य कर रही है. इसके अलावा केले के रेशे से सूत लेकर योगा मैट का निर्माण होता हैं और बैग और कपड़े बनाए जाते हैं. इसके अलावा टेराकोटा मिट्टी से विभिन्न वस्तुएं बनता हैं. आयुर्वेद उत्पाद के रूप में अल्कोहल फ्री सैनिटाइजर बना रहे हैं. विभिन्न प्रकार के साबुन का निर्माण होती हैं तथा बच्चों के लिए आंवले का जैम व कटहल का जैम बनाकर और बेचा जाता हैं.

विदेशों में भी होता है इन उत्पादों का निर्यात

आदिवासी महिलाओं की ये इको-फ्रेंडली उत्पादन की पहूंच लगातार बढ़ती जा रही है. जिसकी सराहना पीएम मोदी समेत अन्य लोग भी कर रहे हैं. अपने इस संगठन की सफलता को लेकर एक आदिवसी महिला कहती है कि एक चाय का कप बनाना एक चुनौतीपूर्ण काम है. इसे विदेशों में भी निर्यात किया जाता है. हमारे हस्तनिर्मित उत्पादों को विदेशों में जाते हुए देखकर खुशी होती है.

प्रधानमंत्री कर चूके हैं इसकी तारिफ

बीतें 30 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इसका जिक्र किया था. पीएम ने प्रकृति के संरक्षण और पर्यावरण के अनुकूल जीवन यापन करने वालों के उदाहरण में इन आदिवासी महिलाओं की सराहना की थी. और कहा था कि इन महिलाओं ने निर्यात के लिए 10 हजार इको-फ्रेंडली टेराकोटा टी कप्स का निर्माण किया. कमाल की बात तो ये है की टेराकोटा टी कप्स बनाने की पूरी जिम्मेदारी इन महिलाओं ने खुद ही उठाई.  क्ले मिक्सिंग से लेकर फाइनल पैकेजिंग तक के सारे काम खुद ही किए.  इन आदिवासी महिलाओं की कोशिशों की जितनी भी तारीफ की जाए, वह कम है.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.