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हिमाचल: आदिवासियों का विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ ‘नो मीन्स नो’ अभियान

Posted on November 2, 2022 - 3:50 pm by

हिमाचल में जहां एक ओर बेरोजगारी, ओल्ड पेंशन स्कीम, महंगाई आदि जैसे मुद्दों पर 12 नवंबर को चुनाव हो रहा है. वहीं आदिवासी क्षेत्रों में विशेषकर किन्नौर तथा लाहौल और स्पीति जिले के लिए पर्यावरण बड़ा मुद्दा है. यहां आदिवासी पर्यावरण बचाने की लड़ाई लड़ रहे है. यहां के आदिवासी चाहते हैं कि ‘वन अधिकार अधिनियम’ को लागू किया जाए. ताकि पहले से ही बर्बाद हो चुकी कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान होने से बचाया जा सके.

इस लड़ाई में किन्नौर के युवा सबसे आगे हैं, जिन्होंने 2021 में इस क्षेत्र में आई भूस्खलन आपदाओं की श्रृंखला के बाद नई जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के खिलाफ ‘नो मीन्स नो’ अभियान शुरू किया था.

विशेषज्ञों ने इसे मानव निर्मित आपदा बताया है

हिंदूस्तान टाईम्स के अनुसार कार्यकर्ता शांता कुमार नेगी ने बताया कि हमने प्रस्तावित 804MW  जंगी थोपन बिजली परियोजना के प्रभावों पर प्रशासन,  सरकार और वैज्ञानिकों के साथ कई चर्चाएं की हैं. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. सरकार के इशारे पर जलविद्युत परियोजनाओं को क्लीन चिट दिया गया है. लेकिन विशेषज्ञों ने विरोध कर इस परियोजना को मानव निर्मित आपदाओं करार दिया है.

उन्होंने आगे बताया कि जिस क्षेत्र में जंगी थोपन परियोजना का निर्माण किया जाएगा.  वह सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र में पड़ता है. साथ ही स्थानीय परिदृश्य के साथ छेड़छाड़ करने से क्षेत्र के लोगों के लिए घातक साबित होगा.

चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार अपनी स्थिति स्पष्ट करें

किन्नौर के चुनाव में भाग ले रहे उम्मीदवारों हिम लोक जागृति मंच और जिला वन अधिकार संघर्ष समिति ने चुनाव के मद्देजर इन परियोजनाओं के निर्माण पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है. इसके साथ सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और हिम लोक जागृति मंच के संयोजक आरएस नेगी ने कहा कि हम उम्मीदवारों से यह भी जानना चाहते हैं कि वे वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को निपटाने के लिए क्या करेंगे. हम इस क्षेत्र में एक गंभीर मुद्दे में पर्यावरणीय गिरावट के रूप में राजनीतिक दलों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.

भूकंप संवेदनशील स्थान पर है यह परियोजना

जिला वन अधिकार समिति के अध्यक्ष जिया लाल नेगी ने कहा कि क्षेत्र की पारिस्थितिकी बहुत नाजुक है. हिमालय अपेक्षाकृत छोटे पहाड़ हैं और पूरा किन्नौर भूकंपीय क्षेत्र चार में स्थित है. यह भूस्खलन के लिए अत्यधिक प्रवण है. किन्नौर में पिछले पांच वर्षों में सबसे भयानक भूस्खलन हुआ है, जिसमें पर्यटकों सहित कई लोग मारे गए हैं.

लोगों ने बांधों के निर्माण के लिए ग्राम पंचायतों से अनापत्ति प्रमाण पत्र की माग की है. इसके साथ संचयी पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (सीईआईए) रिपोर्ट की शर्त को रद्द करने के लिए 2022 में FRA में किए गए संशोधन पर अपने रुख पर उम्मीदवारों से स्पष्टता की मांग की है. इसके अलावा वन अधिकार अधिनियम के शीघ्र कार्यान्वयन का आह्वान करते हुए, लाहौल और स्पीति और किन्नौर जिलों के आदिवासियों ने विभिन्न राजनीतिक दलों से समर्थन मांगा है.

FRA लागू करने में हिमाचल प्रदेश सबसे खराब

बता दें कि FRA 2006,  वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक निवासियों के वन संसाधनों के अधिकारों को मान्यता देता है. इस पर जिया लाल कहते हैं कि इस ऐतिहासिक घटना को 15 साल से अधिक समय बीत चुका है. जिसके तहत ‘वन भूमि’ के रूप में वर्गीकृत क्षेत्रों पर निर्भर समुदायों के अधिकारों को राज्य द्वारा बेदखली के निरंतर खतरे का सामना करने वाले ‘अतिक्रमणकारियों’ के रूप में लेबल किए जाने के बाद मान्यता दी जानी थी.

उन्होंने आगे कहा कि कुल भौगोलिक क्षेत्र के उच्चतम प्रतिशत में से एक होने के बाद भी  हिमाचल FRA लागू करने  में सबसे खराब रिकॉर्ड है. अब तक केवल 300  टाईटल ही जारी किए गए हैं.

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