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त्रिपुरा चुनाव: पूर्वोत्तर में क्यों हो रही अलग राज्य ‘टिपरालैंड’ की मांग

Posted on February 4, 2023 - 2:52 pm by

त्रिपुरा में 70 वर्षीय दुर्जोय देबबर्मा के लिए “बुबागरा” तारणहार है. शाही वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा बुबागरा (राजा) हैं. वह जनजाति-आधारित राजनीतिक दल टिपरा मोथा के प्रमुख हैं, जो आदिवासी क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 20 सीटों में प्रभाव रखते है. राज्य में 60 सीटें हैं.

जैसा कि त्रिपुरा 16 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है. प्रद्योत 19 जातीय समुदायों के अलग ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ राज्य के सपने को लेकर चल रहे हैं. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार  त्रिपुरा की आबादी 36.74 लाख है, उसमें आदिवासियों की आबादी 31.8 फीसदी है.

बता दें कि वर्ष 1949 में भारतीय संघ में विलय से पहले पूर्व रियासत पर माणिक्य वंश के तत्कालीन राजघराने का शासन था. टिपरा मोथा त्रिपुरा के लगभग 70 फीसदी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को काटकर ग्रेटर टिपरालैंड के निर्माण की मांग किया जा रहा है.

75 सालों से उपेक्षित हैं त्रिपुरा के आदिवासी

दुर्जोय अलग राज्य मांगने के कारण को लेकर कहते हैं कि राजतंत्र को लोकतंत्र से बदल दिया गया है लेकिन हम अभी भी बुबागरा को इस जमीन का मालिक मानते हैं. उन्होंने यह महसूस करने के बाद कि त्रिपुरा के आदिवासियों का धीरे-धीरे सफाया हो सकता है, टिपरा मोथा (2019 में) शुरू किया था. वह हमारे रक्षक हैं.

उन्होने आगे कहा कि हम लगभग 75 वर्षों से उपेक्षित रहे हैं, इसलिए हम सभी ने इस चुनाव में राजा का समर्थन करने का फैसला किया है. हमने दो साल पहले त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद में उनकी पार्टी को सत्ता के लिए चुना था. काउंसिल अपने पास मौजूद सीमित फंड से वह सब कुछ करने की कोशिश कर रही है जो वह कर सकती है.

परिषद में 30 सीटें हैं और 28 सीटों (दो मनोनीत) पर चुनाव होता है. टिपरा मोथा ने 18 और बीजेपी ने 9 सीटें जीती थीं. एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी. परिणाम आदिवासी क्षेत्रों में जनजाति आधारित पार्टी की लोकप्रियता का प्रमाण हैं.

बुबागरा का समर्थन

वहीं साधन देबबर्मा कहते हैं कि राज्य की मांग पर आदिवासी एकमत हैं. उन्हें विश्वास है कि टिपरा मोथा उनके हितों के लिए लड़ सकता है. आदिवासी इलाकों में पार्टी को लेकर चर्चा है. हम सभी बुबागरा का समर्थन करते हैं. हमें यकीन है कि उनकी पार्टी सरकार बनाएगी. पश्चिम त्रिपुरा जिले में मांडवी से पाटनी तक और धलाई जिले में मांडवी से अंबासा तक की सड़कों पर, आदिवासियों के समूहों को सड़क के किनारे कुछ गंभीर चर्चाओं में तल्लीन देखा गया. हमने कांग्रेस, वामपंथी और भाजपा को देखा है लेकिन हमें अपने संवैधानिक अधिकार (राज्य का दर्जा) नहीं मिला है. हम बुबाग्रा पर अपनी उम्मीदें लगा रहे हैं.

मांडवी के रहने वाले सुकेश देबबर्मा ने कहा कि सत्तारूढ़ बीजेपी-इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) आदिवासियों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. मौजूदा सरकार ने समस्याओं का समाधान नहीं किया. जनजातीय क्षेत्रों में शैक्षिक संस्थानों सहित सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे की कमी है. 25 साल का वाम शासन (1993-2018) बेहतर था. हमें अधिक उम्मीदें थीं लेकिन भाजपा देने में विफल रही.

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