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त्रिपुरा: आदिवासी पार्टियों में सुलह, चुनाव में बीजेपी को हो सकता है नुकसान

Posted on January 23, 2023 - 12:16 pm by

त्रिपुरा में अलगाव के बढ़ते संकेतों के साथ, सत्तारूढ़ भाजपा चुनावी राज्य में अपने प्रमुख सहयोगियों में से एक  इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) के रास्ते अलग होने की ओर देख रही है. आईपीएफटी के बीच एक बंद दरवाजे की बैठक में गुवाहाटी में TIPRA मोथा के प्रमुख प्रेम कुमार रियांग और एक अन्य प्रभावशाली आदिवासी गुट के प्रमुख प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा ने शनिवार रात को दोनों पक्षों ने 16 फरवरी को होने वाला विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ने का फैसला किया.

60 सदस्यीय विधानसभा में एक तिहाई सीटें आदिवासी इलाकों में आती हैं. वर्ष 2018 में IPFT ने भाजपा के साथ गठबंधन किया. यहां तक कि विपक्ष – कांग्रेस और वामपंथी – विभाजित थे. इस बार, न केवल ‘ग्रेटर टिप्रालैंड’ की मांग करने वाले आदिवासी दल करीब आए हैं, बल्कि कांग्रेस और सीपीएम ने भी गठबंधन किया है, जो भाजपा की सत्ता में वापसी की कोशिश को गंभीर रूप से बाधित कर रही है.

IPFT के अध्यक्ष प्रेम कुमार रियांग ने कहा कि हमने सोचा कि हमें ग्रेटर टिप्रालैंड के लिए लड़ने वाली सेना में शामिल होना चाहिए. हमने टिपरा मोथा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. हालांकि, बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने मांग पर चर्चा तक नहीं की.

वहीं शाही वारिस देबबर्मा ने कहा कि दोनों पार्टियां “ग्रेटर टिप्रालैंड की संवैधानिक मांग” का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एक ही ध्वज और प्रतीक के साथ चुनाव लड़ने पर सहमत हैं.

तिप्रालैंड को लेकर देबबर्मा कहते हैं कि कुछ लोगों को डर है कि अगर ग्रेटर तिप्रालैंड राज्य का गठन किया गया, तो जनजातीय लोग अधिकांश क्षेत्रों में कब्जा कर लेंगे. लेकिन इस तरह बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक भय निराधार है. कई बंगाली आदिवासी परिषद क्षेत्र में रहते हैं. हम चाहते हैं कि वे शांति और सद्भाव से रहे. देबबर्मा ने आगे कहा कि त्रिपुरा रियासत में बंगाली और आदिवासी शांति से रहते थे और हम उस परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

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