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जल, जंगल, जमीन है तभी हमारा वजूद है: हेमंत सोरेन

Posted on March 25, 2023 - 1:24 pm by

हमारे पूर्वजों ने हमें बहुत खूबसूरत समाज बनाकर हमें सौंपा है, इसमें किसी से भेदभाव और प्रतिद्वेश भाव नहीं है. यहां कई पहाड़, नदीं, जंगल है, लेकिन शहर आते-आते वे विलुप्त होने लगते हैं. सरकार ने समाज की धार्मिक व्यवस्था को संरक्षित करने का निर्णय लिया है. चाहे सरना स्थल हो, मसना स्थल हो, धुमकुड़िया हो, न सभी धार्मिक स्थलों को संरक्षित किया जाएगा. उक्त बातें झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने रांची स्थित सिरमटोली सरना स्थल पर आयोजित सरहुल पूजा के दौरान कहीं.

शोभायात्रा में बंधा समा

बता दें कि सरहुल झारखंड का सबसे बड़ा त्यौहार है. रांची में चैत्र माह के तृतीया शुक्ल पक्ष में आदिवासियों के द्वारा सरहुल शोभायात्रा निकाली जाती है.शोभायात्रा के दौरान हर हाथ मांदर और नगाड़े को मधुर धुन देने में व्यस्त था. सभी एक दूसरे का हाथ पकड़कर नृत्य करने मे मशगूल दिखे. लाल पाड़ साड़ी व अन्य आभूषणों से सजी लड़कियां और पगड़ी, धोती और गंजी पहने लड़कों ने महुआ फुलाय गेल, सरई कुसुम रे, गोटे झबराय गेल, सारजोम बा रेकिना मिरू किन सुड़ा सांगेन रेकिता कारें किन, जतरा बेचा-बेचा किचरी गा मड़िखिया गीतों पर समा बंध गया था.

नृत्य करती युवतियां/Niranjan kujur/Fb

हेंमत सोरेन ने कहा कि गांव की तरह शहर हरा भरा रहे, इस दिशा में सामुहिक प्रयास करने की आवश्यकता है. सरहुल का त्योहार एक ओर हमें प्रकृति से जोड़ता है, तो दूसरी तरफ अपनी समृद्ध परंपरा और संस्कृति का सुखद अहसास कराता है. यही वजह है कि आदिवासी समाज के लोग वर्षों से प्रकृति पूजा की परंपरा निभाते चले आ रहे हैं.

1961 में निकली थी पहली शोभायात्रा

बता दें कि सरहुल को मुख्यता झारखंड के रांची राजधानी में बड़े स्तर पर मनाया जाता है. वर्ष 1961 से हर साल झारखंड के रांची में झारखंड के सभी आदिवासियों के द्वारा इकट्ठा होकर सरहुल मनाने की परंपरा की शुरूआत हुई थी. इसका उद्देश्य रांची स्थित सिरम टोली के सरना स्थल (आदिवासियों का पूजा स्थल) को बचाना था.

जानकारी के अनुसार साल 1961 में सरना स्थल को गांव के कुछ लोगों ने रामगढ़ के एक मोटर गैराज व्यापारी को बेच दिया था. ऐसे में सरना स्थल की जमीन को बचाने के लिए सिरम टोली के लोगों ने करम टोली के लोगों को संपर्क किया था.

इस तरह से करीब सौ लोगों के साथ शोभायात्रा निकाली गई थी, इसके बाद हातमा सरना स्थल पर सरहुल पूजा की शुरूआत की गई. करमटोली में सरहुल पूजा करने के बाद कार्तिक उरांव को बैलगाड़ी में बैठाकर जुलूस निकाला गया था. इसके बाद आदिवासी छात्रावास के छात्रों के द्वारा मांदर की थाप पर नाचते-गाते हुए करमटोली से सिरम टोली सरना स्थल तक पहुंची थी.

साल 1964 से हातमा सरना स्थल स्थल पर पूजा की शुरूआत हुई और वहीं से शोभायात्रा निकाली जाने लगी. इसी के बाद से यह यात्रा विशाल होती गई.

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