Skip to main content

क्या है आदिवासियों का सरहुल पर्व, जानिए कैसे इसे मनाया जाता है

Posted on March 22, 2023 - 5:19 pm by

इन दिनों आदिवासियों के सबसे बड़े और मुख्य त्यौहारों में से एक सरहुल पर्व की खूब चर्चा हो रही है. सरहुल पर्व को झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बंगाल और मध्य भारत के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है. सरहुल की शुरूआत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है. यह वो समय होता है जब महुआ के फूल, पलाश के फूल, सरई के फूल आदि बसंत ऋतु के दौरान लहलहाने लगते हैं. इसी खूबसूरत पल का जश्न मनाने के दौरान आदिवासियों का सरहुल पर्व इसमें चार चांद लगाता है.

सरहुल को आदिवासी भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे – उरांव में खद्दी, मुंडा में बा, हो में मागे, खड़िया में जंकोर और संतालों में बाहा आदि से जाना जाता है. इस त्यौहार को मनाने वाले आदिवासी अपने-अपने क्षेत्रों में अलग-अलग तिथि को मनाते हैं. सरहुल मनाने के तरीकों में जगह-जगह पर थोड़ा बहुत बदलाव भी देखा जाता है. हांलाकि सभी जगह पूजा का महत्व एक होता है, जो कि प्राकृतिक महत्व से जुड़ा है.

सरहुल की पूजा

आदिवासियों द्वारा सरहुल मनाने के विभिन्न प्रक्रियाओं में से एक कुछ इस प्रकार है. झारखंड के हजारीबाग जिले के डाड़ी प्रखंड से आदिवासी धरमा बेदिया बताते हैं कि सरहुल पूजा के एक दिन पहले रात में गांव के पाहन (मुख्य पुजारी) और प्रमुख लोगों द्वारा एक डोभा से पानी छीट कर यानि पानी को निकाल कर खाली किया जाता है.

इसके बाद डोभा में जो नया पानी संग्रह होता है, उसे मिट्टी के नए घड़े और एक लोटे में भरा जाता है. डोभा में नए पानी के संग्रह होने से इस वर्ष बारिस के कम-ज्यादा या अच्छा-बुरा होने का अंदाजा लगाया जाता है. घड़े में भरे गए पानी को गांव पूज्य स्थल यानि सरना स्थल में रखा जाता है. इसके बाद गांव में अपने घरों में बने पारंपरिक पकवान और मदीरा का सेवन कर गाजे बाजे के साथ गीत गाकर नृत्य कर आनंद उठाते हैं.

इस प्रथा के बाद अगली सुबह को पाहन सहित गांव के प्रमुख लोग अपने पवित्र सरना स्थल जाते हैं. पूजा अर्चना शुरू करने से पहले गांव के पाहन को उसी घड़े के पानी से नहलाया जाता है और नए कपड़े धोती गमछा पहनाया जाता है. सरना में जहां पूजा अर्चना किया जाता है, वहां सिंदूर और अरपन यानि चावल के आटे से पाहन पूजा करता है.

इस दौरान सरई(साल) के पेड़ की पूजा की जाती है, जो मुख्य होता है. इसमें सरई का फूल और पत्ते का भी इस्तेमाल किया जाता है. सरई(साल का पेड़) के पूज्य पौधे को एक धागे से बांध कर पाहन उसके चारों तरफ फेरे लेता है. इस प्रक्रिया के समय पाहन को ग्रामीण कंधे पर उठा कर रखते हैं.

सरना में इन प्रथाओं को पूरा करने के दौरान एक दिल्चस्प गतिविधि भी देखने को मिलती है, जो आदिवासियों के शिकार करने से संबंधित होती है. इस गतिविधि को भी सरहुल पर्व मनाने का एक भाग बताया गया है. दरअसल, सरना में एक काली कटोर यानि मुर्गी को खुला छोड़ दिया जाता है. जिसके बाद सब मिल कर पारंपरिक तीर धनुष से उसका शिकार करते हैं. शिकार करने के बाद उस कटोर को सरना में ही प्रसाद के तौर पर पकाया जाता है और पुरुषों में वितरण किया जाता है. सरना स्थल में मौजूद सभी लोगों को पाहन सरई के फूलों को कानों में लगाता है.

इसके साथ ही पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाकर, गीत गाकर नृत्य करते हैं और पूरे गांव में धूमते हैं. बता दें कि इस प्रसाद को ग्रहन करने के लिए महिलाओं को प्रतिबंध होता है. वहीं इसके अलावा कई जगहों में महिलाओं को पूजा के दौरान सरना स्थलों में घुसने की अनुमति नहीं होती है. हांलाकि वर्तमान में अब महिलाएं भी कई जगह इसमें शामिल होते देखी जा रही हैं.

गांव में धूमने के साथ पाहन घर-घर में सरई फूल लगाता है. गांव के लोग पाहन का अपने घर में पैर धोकर स्वागत करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं. इस बीच बच्चे, बूढ़े, जवान, महिला और पुरुष सभी नाचते गाते खुशियां मनाते नजर आते हैं.

रांची में निकाली जाती है सरहुल का सबसे बड़ा जुलुस

सरहुल को मुख्यता झारखंड के रांची राजधानी में बड़े स्तर पर मनाया जाता है. वर्ष 1961 से हर साल झारखंड के रांची में झारखंड के सभी आदिवासियों के द्वारा इकट्ठा होकर सरहुल मनाने की परंपरा की शुरूआत हुई थी. इसका उद्देश्य रांची स्थित सिरम टोली के सरना स्थल (आदिवासियों का पूजा स्थल) को बचाना था.

जानकारी के अनुसार साल 1961 में सरना स्थल को गांव के कुछ लोगों ने रामगढ़ के एक मोटर गैराज व्यापारी को बेच दिया था. ऐसे में सरना स्थल की जमीन को बचाने के लिए सिरम टोली के लोगों ने करम टोली के लोगों को संपर्क किया था.

इस तरह से करीब सौ लोगों के साथ शोभायात्रा निकाली गई थी, इसके बाद हातमा सरना स्थल पर सरहुल पूजा की शुरूआत की गई. इसी बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री के बुलावे पर कार्तिक उरांव लंदन से लौटे थे. वे रांची स्थित एचईसी डिप्टी चीफ इंजीनियर के पद पर थे. उन्हें भी जुलुस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था.

करमटोली में सरहुल पूजा करने के बाद कार्तिक उरांव को बैलगाड़ी में बैठाकर जुलूस निकाला गया था. इसके बाद आदिवासी छात्रावास के छात्रों के द्वारा मांदर की थाप पर नाचते-गाते हुए करमटोली से सिरम टोली सरना स्थल तक पहुंची थी.

साल 1964 से हातमा सरना स्थल स्थल पर पूजा की शुरूआत हुई और वहीं से शोभायात्रा निकाली जाने लगी. इसी के बाद से यह यात्रा विशाल होती गई.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.