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क्या है संतालियों का बाहा पर्व? क्यों है यह खास? जानिए

Posted on March 10, 2023 - 4:00 pm by

नेहा बेदिया

संथाल जनजातियों में फिलहाल बाहा पर्व की उल्लास है. ये पर्व कुछ ऐसा है कि इसे आदिवासी मुख्यत: संताल परगना के लोग स्वच्छ पानी को एक दूसरे पर उड़ेल कर आनंद उठाते हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के धुन पर नाच गान करते हैं. एक दूसरे के ऊपर पानी उड़ेल कर खुशी मनाने के इस परंपरा को बाहा पर्व कहते हैं. जिसे बहुत ही धूम धाम से हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है.

बाहा आदिवासी बाहुल्य गांवों में तीन दिनों तक चलने वाला पर्व है. जिसे आदिवासी खास कर संताल के लोग उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं. आपको बता दें कि बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है, जो प्रकृति और मानव के संबंधों से जुड़ा एक त्योहार है. इस पर्व में साल वृक्ष के फूलों का विशेष महत्व होता है. इसके बिना बाहा पर्व को अधूरा माना जाता है.

बाहा पर्व के तीनों दिन के अलग अलग नाम और नियम है. पहला दिन बहुत धूमधाम और हर्षोल्लास से गांव के जाहेर थान में मनाया जाता है. इस दिन को दाप माह कहा जाता है, जिसमें जाहेर थान में जाहेर की छावनी यानी पुआल की छत बनाते हैं.

पर्व के दूसरे दिन को बोंगा माह कहते हैं. इस दिन ग्रामीण गांव के नायकी यानी पुजारी को उसके आंगन से नाच-गाने के साथ सम्मान के साथ जाहेर थान ले जाते है. वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी यानी पूज्य पेड़ ‘सारजोम पेड़’ जिसे सखुवा पेड़ भी कहते हैं, उसके नीचे पूज्य स्थलों का साफ सफाई और गोबर से लिपाई पुताई कर शुद्धिकरण किया जाता है. जहां पूजा अर्चना कर सखुवा, महुवा का फूल चढ़ाया जाता है.

बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू धोरोम गोसाई आदि ईष्ट देवी-देवताओं के नाम पर बलि दी जाती है. नायकी सभी महिला-पुरुष और बच्चों को सखूवा पेड़ का फूल देते हैं. जिसे पुरुष कान में और महिला जुड़े में लगाते हैं, साथ ही बाहा गान बजान होता है.

नाच-गान और प्रसादी ग्रहण करने के बाद सभी ग्रामीण नायकी को फिर से नाच-गान करते हुए गांव ले जाते हैं. जहां नायकी गांव के सभी घरों में सखुआ का फूल देते हैं और सभी ग्रामीण घर वाले नायकी के सम्मान में उनका पैर धोते हैं. फूल मिलते ही ग्रामीण एक-दूसरे पर पानी की बौछार करते हैं और इसका आनंद लेते हैं.

तीसरे और अंतिम दिन को शरदी माह कहते हैं. इस दिन भी सभी ग्रामीण एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, नाचते-गाते हैं और एक-दूसरे के घर जाते हैं और खान-पान करते हैं. संताल आदिवासी बाहा पर्व सृष्टि के सम्मान में मनाते हैं. इसका प्रकृति और मानव के साथ सीधा संबंध है. इसी समय सभी पेड़ों में फूल आते हैं. बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है. बाहा त्योहार में प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव दिखता है.

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