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टिपरा मोथा द्वारा ग्रेटर टिपरालैंड की मांग क्या है?

Posted on February 18, 2023 - 10:41 am by

त्रिपुरा में नया राजनीतिक दल तिपरा इंडिजिनियस प्रोग्रेशिव रिजनल एलाएंस (TIPRA) मोथा बना है. जिसे वर्ष 2019 में त्रिपुरा के अंतिम राजा के बेटे प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा ने बनाया था.  देबबर्मा ने ग्रेटर टिपरालैंड की अपनी मांग के साथ हलचल पैदा कर दी है. इस मूल मांग के साथ टिपरा मोथा पार्टी ने अन्य आदिवासी राजनीतिक दलों को भी अपने पाले में ले लिया है. वर्ष 2021 में त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के चुनावों में चुनावी राजनीति में इसका पहला प्रवेश एक तेज जीत से पहचान में आया,  जहां इसने 28 में से 18 सीटें हासिल की.

त्रिपुरा में 2023 विधानसभा के लिए चुनाव डाले जा चुके हैं और इसके नतीजे 2 मार्च को देखने को मिलेंगे. हालांकि टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा ने स्पष्ट किया है कि ये उनका अंतिम कैंपेन था. हालांकि वे ग्रेटर टिपरालैंड मिलने तक इस संघर्ष के साथ जुड़े रहेंगे.

ग्रेटर टिपरालैंड क्या है?

ग्रेटर टिपरालैंड टिपरा मोथा की मुख्य वैचारिक(Core Ideological) मांग है. पार्टी ने पिछले सप्ताह एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया, जिसमें कहा गया कि वह भारत के संविधान के अनुसार त्रिपुरा के स्वदेशी लोगों के अधिकारों को कायम रखने के लिए एक स्थायी समाधान की मांग करने के लिए प्रतिबद्ध है. इसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत त्रिपुरा की 19 आदिवासियों के लिए एक नया राज्य बनाना है. अपने वर्तमान स्वरूप में नए राज्य की रूपरेखा TTAADC क्षेत्रों से आगे बढ़कर कई अन्य गाँवों को शामिल करेगी जहाँ तिप्रसा (त्रिपुरा के मूल निवासी) बड़ी संख्या में रहते हैं. इसके अलावा TIPRA मोथा नेता और TTAADC के अध्यक्ष जगदीश देबबर्मा के अनुसार मोथा देश और दुनिया के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले टिपरासा के साथ जुड़ने के लिए उनके भाषाई, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करने के लिए टास्क फोर्स की स्थापना करेगा.

जबकि नई पार्टी की मूल विचारधारा जातीय राष्ट्रवाद पर टिकी हुई है. मोथा के नेतृत्व ने खुद को “आदिवासियों की, आदिवासियों द्वारा और केवल आदिवासियों के लिए” पार्टी के रूप में पेश नहीं करने के लिए सावधान किया है. प्रद्योत माणिक्य ने मीडिया बातचीत में स्पष्ट रूप से कहा है कि उनकी पार्टी समावेशी है और गैर-आदिवासी आबादी को भी साथ लेकर चलेगी.

इस मांग की उत्पत्ति क्या है?

ग्रेटर टिपरालैंड की मांग 2009 में इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) द्वारा त्रिपुरा की इंडिजिनस नेशनलिस्ट पार्टी (INPT) से अलग होने के बाद की गई. लेकिन मोथा नेता जगदीश देबबर्मा असहमत हैं. वे बताते हैं कि पहले की टिपरालैंड की मांग टीटीएएडीसी क्षेत्रों से त्रिपुरा की आदिवासी आबादी के लिए एक अलग राज्य बनाने की थी. वर्तमान मांग TTAADC क्षेत्रों से अलग है और इसमें कम से कम 36 और गाँव शामिल हैं जहाँ जनजातीय आबादी 20 से 36% के बीच है. यह किसी भी तरह से नौ प्रतिशत मुस्लिम आबादी और इन सीमाओं के भीतर आने वाली बहुसंख्यक हिंदू आबादी को बाहर नहीं करेगा.

वह आगे कहते हैं कि वर्ष 1941 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा में आदिवासियों और गैर-आदिवासियों की जनसंख्या का अनुपात लगभग 50:50 था. हालांकि अगली जनगणना के अनुसार पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थियों के भारी प्रवाह के कारण जनजातीय आबादी 37% से थोड़ा कम हो गई थी. वर्ष 1950 और 1952 के बीच लगभग 1.5 लाख शरणार्थियों ने आश्रय के लिए त्रिपुरा में प्रवेश किया था. शरणार्थियों की बाढ़ ने कई कटु मतभेदों को जन्म दिया और अंततः आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच संघर्ष 1980 में बढ़ गया और सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया. इस समय के दौरान स्वायत्त क्षेत्रों या अलग राज्य की मांग संप्रभुता और स्वतंत्रता के रूप में बदल गई. हालांकि, राज्य और विद्रोही समूहों के बीच एक राजनीतिक समझौता होने के बाद राज्य की मांग को पुनर्जीवित किया गया.

इस मांग ने त्रिपुरा को कैसे प्रभावित किया है?

सशस्त्र विद्रोह से राज्य के उभरने के बाद से आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच पहले से ही  संबंधों में काफी ध्रुवीकरण हुआ है. टिपरा मोथा ने नवंबर में एक विशाल रोड शो किया, जिसे राज्य में आदिवासियों की सबसे बड़ी राजनीतिक लामबंदी के रूप में देखा गया. ग्रेटर टिपरालैंड टिपरा मोथा की मुख्य वैचारिक मांग है. इसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत त्रिपुरा की 19 स्वदेशी जनजातियों के लिए एक नया राज्य बनाना है.

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