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आदिवासियों के उपचार पद्धति के संरक्षण के लिए क्या कर रही है सरकार?

Posted on October 7, 2022 - 5:18 am by

विजय उरांव

आदिवासी समुदायों के लोग प्रकृति के साथ आपसी समझ को युगों-युगों से संरक्षित रखे हुए हैं, क्योंकि वे सदैव ही जल और जंगलों के सबसे करीब रहे हैं। इसी के बूते उन्होंने धीरे-धीरे स्वदेशी/जैविक चिकित्सा पद्धति को खड़ा किया है। प्रकृति के पास सूक्ष्म संकेतों के माध्यम से प्रत्येक जीव के साथ संवाद करने का एक अनूठा तरीका होता है।  पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली अंधविश्वास और अनुष्ठान नहीं, बल्कि इससे आगे बढक़र पारम्परिक इलाज में कारगर है। शोध के न होने और पारंपरिक इलाज पद्दति से दूर होने के कारण पारम्परिक चिकित्सा और उपचार की ये प्राचीन विधियां अब विलुप्त होती जा रही हैं।

आदिवासी उपचार पद्धति से संबंधित अतारांकित सवाल संख्या AU1041  में कांग्रेस के इडुक्की लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा सांसद एडवोकेट डीन कुरियाकोस ने जनजातीय कार्यमंत्रालय से पुछा था कि सरकार ने देश में जनजातियों की उपचार पद्दति के संरक्षण हेतु कोई पहल की है? यदि हां तो इसका ब्यौरा क्या है? इसके अलावा अपने राज्य (जहां से सांसद हैं) केरल राज्य में उपचार के संबंध में जनजातियों के पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव है तो उसका ब्यौरा क्या है। जिसका जवाब 26 जुलाई 2021 को जनजातीय कार्य राज्यमंत्री रेणुका सिंह सरुता ने दिया था, जिसमें उन्होंने बताया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थान/प्रसिद्ध अनुसंधान संस्थानों को “जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सहायता” और ‘जनजातीय त्यौहार, अनुसंधान सूचना और जन शिक्षा’ परियोजनाओं के तहत जनजातीय औषधीय पद्धतियों और औषधीय पौधों पर अनुसंधान कार्य करने के लिए निधियां प्रदान करता है। अनुसंधान संगठन सजातीय चिकित्सा, उपचारक और रोगों के उपचार के उनके उपचरात्मक अभ्यासों की पहचान, दास्तावेजीकरण और विवरण एकत्र करने के लिए कई कार्यक्रम और गतिविधियां संचालित करते है। इसके अलावा, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जनजातीय अनुसंधान संस्थान, उत्तराखंड को पारंपरिक चिकित्सा और उपचार पद्धतियों से संबंधित सभी परियोजनाओं के लिए नोडल और समन्वयक टीआरआई बनाया है।

राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थानों/अनुसंधान संगठनों द्वारा शुरू की गई ऐसी परियोजनाओं में 1. केरल के 300 से अधिक प्रमुख जनजातीय चिकित्सकों के ज्ञान का दास्तावेजीकरण किया गया है। 2. सिक्किम राज्य की टीआरआई ने “सिक्किम की लेप्चा जनजातीय द्वारा एथनो औषधीय पौधों की प्रथाओं की पहचान, प्रलेखन और सत्यापन” पर अध्ययन किया गया है। 3. राजस्थान के एम.एल.वी जनजातीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान ने जनजातीय औषधीय ज्ञान के प्रलेखन और अनुसंधान के लिए एक परियोजना की है। 4. मध्य प्रदेश टीआरआई ने जनजातियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली मेडिसिन पर एक अध्ययन किया है। मध्य प्रदेश की जनजातीय आबादी में इस्तेमाल होने वाले औषधीय पौधों की सक्रिय सामग्री और नृवंशविज्ञान भूमिका के प्राकृतिक उत्पाद अलगाव के साथ एआईआईएमएस(एम्स), भोपाल में एक परियोजना को मंजूरी दी गई है- इन विट्रो एंटी नियोप्लास्टिक प्रोपर्टी पर विशेष ध्यान देने के साथ औषधीय रसायन विज्ञान के परिपेक्ष्य में। 5. कर्नाटक के जनजातियों के बीच स्वदेशी ज्ञान का संरक्षण के लिए हक्किपिक्की के बीच प्रजाति(एथनों) तथा राजगोंड के बीच प्रजाति (एथनों) औषधीय पद्धति पर शोध अध्ययन। 6. ओड़िशा में चयनित अनुसूचित जनजाति समुदायों के बीच पारंपरिक औषधीय चिकित्सा पद्धतियां ओड़िसा के कंध और संताल के बीच स्वदेशी एथनों – औषधीय पद्धतियांन, पारंपरिक जनजीतीय चिकित्सा (बोंडा, दीदाई, कंधा, डोंगरिया कंधा, संताल, मुंडा, भूमिज, कोल, खड़िया, मनकिरदिया, जुआंग, सौरा, कोया, किसान, धारुआ, उरांव, भुइयां, गडबा, भुंजिया, गोंड) पर संग्रह। ओड़िसा के आदिम जनजातियों द्वारा भोजन के लिए स्थानीय वनस्पतियों और जीवों के चयन, सतत उपयोग पर स्वदेशी ज्ञान। खाद्य और पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक संभावित संसाधन। 7. ‘असम के औषधीय पौधों का प्रलेखन’ पर जनजातीय अनुसंधान संस्थान द्वारा शोध अध्ययन किया गया है। 8. महाराष्ट्र में जनजातीय समुदायों की पारंपरिक हीलिंग प्रथाओं का अनुसंधान और प्रलेखन किया जा रहा है। 9. मनिपुर में जड़ी बूटियों और पौधों पर अनुसंधान अध्ययन । 10. त्रिपुरा की जनजातीय लोक औषधी, उपचारकर्ताओं तथा चिकित्सकीय पद्धतियां, औषधीय पौधे और जड़ी बूटियों, आदिवासी समुदाय के बीच इसके उपयोग पर अध्ययन, उपजाति कोबिराज ओ ओचेंदर वनौषधी ओ चास पद्धति (बंगाली)। 11. मिजोरम में पारंपरिक चिकित्सा और पौधों की प्रथाओं का अनुसंधान, पेटेंट और दस्तावेजीकरण

‘जनजातीय त्यौहार, अनुसंधान सूचना और जन शिक्षा’ योजना के तहत जनजातीय औषधीय प्रथाओं और औषधीय पौधो पर शोध के लिए प्रसिद्ध संस्थानों को परियोजना स्वीकृत की गई है –

1. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, गुवाहटी, इस संस्थान को सक्षम बनाने के लिए पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल पद्दतियां, पारंपरिक प्रलेखन किया जा रहा है। इसके अलावा ह्रदय-उपापचय संबंधी रोगों के इलाज के लिए जनजातीय आबादी द्वारा उपयोग किए गे पारंपरिक औषधीय ज्ञान को मान्यता देना है।

2. पारवारा आयुर्विज्ञान संस्थान, लोनी, इस संस्थान के द्वारा महाराष्ट्र राज्य में विभिन्न जनजातीय समुदायों की पारंपरिक जनजातीय हीलर्स की पहचान सूची बनाने के लिए सर्वेक्षण, जनजातीय स्वास्थ्य परंपराओं का अध्ययन, प्रलेखन और परीक्षण, जनजातियां औषधियां (हिलिंग पद्दतियां और एथनो मेडिसन (प्रजाति औषधी))

3. पतंजलि अनुसंधान संस्थान, देहरादून, पारंपरिक चिकित्सा और उपचार पद्दतियां

4. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, जोधपुर, (क) राजस्थान के सिरोही जिले के स्थानीय/पारंपरिक हीलर्स के पारंपरिक ज्ञान और पद्दतियां के ज्ञान पद्दति शास्त्र का अध्ययन, (ख) राजस्थान के सिरोही जिले के पारंपरिक हीलर्स के बीच व्यवहार परिवर्तन संबंधी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए क्षेत्र-विशिष्ट मॉड्यूल का प्रभाव (ग) राजस्थान के सिरोही जिले के देशी निवासियों की स्वास्थ्य आवस्यकताओं के विशेष संदर्भ के साथ टेलीमेडिसीन का प्रयोग

5. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक, मध्य प्रदेश – जातीय/पारंपरिक दवाओं का दस्तावेजीकरण (संग्रह, तैयारी, उपयोग और अभ्यास की प्रक्रिया)

6. अमृता विश्व विद्यापीठम, केरल – ओडिसा में मौजूदा स्वास्थ्य प्रणालियों में जागरूकता पैदा करके और जनजातीय उपचारकर्ताओं को एकीकृत करके जनजातीय स्वास्थ्य को मजबूत करना।

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