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धर्म के चंगुल में फंसते जा रहें आदिवासी : ग्लैडसन

Posted on October 12, 2022 - 6:13 am by

आदिवासी समाज के लिए धर्म एक सामाजिक कुरीति बन गया है। इसने आदिवासी समाज को कमजोर कर दिया है। यदि सौ साल पहले ऐसी ही स्थिति होती तो पहाडिया विद्रोह, संताल विद्रोह, कोल विद्रोह एवं बिरसा उलगुलान शायद नहीं होता और आदिवासी लोग अंग्रेजों की गुलामी करते। आज के आदिवासी युवक-युवतियां सिर्फ धर्म-धर्म ही करते रहते हैं। और इसी धर्म को आधार बनाकर स्वंय को असली और दूसरे को नकली आदिवासी बोलते रहते हैं। यही लोग हैं जो सरना-ईसाई के नाम पर समाज में नफरत फैलाते हैं। मुझे हंसी आती है कि आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर, गैर-आदिवासी समाज का व्यक्तिवादी जीवन शैली अपनाकर, उपभेक्तावाद संस्कृति से सराबोर, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में लिप्त, शहरीकरण का हिस्सा बनकर, आधुनिक गाड़ियों में सैर कर एवं आधुनिक टेक्नोलाॅजी से लैश खूद को ये लोग असली और दूसरों को नकली आदिवासी कहने का हिम्मत कैसे करते हैं? इन लोगों को अंडमान-निकोबार लेकर जाना चाहिए। कसम से! वहां के चार आदिवासी समुदाय – ग्रेट अंडामनीज, जारवा, ओंगी एवं सेंटिनली लोगों को देखकर ये लोग उन्हें ‘‘असभ्य’’ नहीं कह दिया तो फिर मुझे बताना। आदिवासियों के लिए ‘‘आदिवासी और आदिवासियत’’ से कोई बड़ी पहचान नहीं हो सकती है। आदिवासी होने के लिए आदिवासियत पर जीना पड़ेगा न कि धरम-धरम करने से आदिवासी समाज बचेगा। हम इन दिनों ऐसे ही बुनियादी मुद्दों पर निरंतर छोटा से बड़ा समूह के साथ चर्चा कर रहे हैं। बौद्धिक उलगुलान से आदिवासी समाज बचेगा न की धरम की लड़ाई लड़ने से। जय आदिवासी!

ग्लैडसन डुंगडुंग (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और यह लेखक के निजी विचार है।)

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