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किसी समुदाय को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल/हटाने की प्रक्रिया क्या है?

Posted on October 4, 2022 - 2:54 am by

विजय उरांव
सूची में नए आदिवासी समूदाय कौन से हैं? उसका चयन कैसे किया जाता है? प्रक्रिया क्या है?
केंद्रीय मंत्रीमंडल ने बुधवार 14 सितंबर को अनुसूचित जाति/जनजाति आदेश(संशोधन) अधिनियम, 2022 पारित होने के बाद छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में कई आदिवासी समुदायों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में अधिसूचित करने के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान कर दी। इसमें छत्तीसगढ़ के भारियाभूमिया के पर्याय के रूप में भूईंया(Bhuinya), भूईंया(Bhuiyan), भूंया(Bhuyan) । Bharia नाम के अंग्रेजी संस्करण को बिना बदलाव किए भारिया(Bharia) के रूप भारिया का सुधार। पांडो के साथ पंडो, पण्डो, पन्डो । धनवार(Dhanwar) के पर्याय के रूप में धनुहार(Dhanuhar), धनुवार(Dhanuwar)। गदबा(Gadba, gadaba), गोंड(Gond) के साथ गोंड़, कोंध के साथ कोंद(Kond), कोडाकू के साथ कोड़ाकू(Kodaku), नगेसिया (Nagesia), नागासिया(Nagasia) के पर्याय के रूप में किसान (Kisan), धनगढ़(Dhangad) का परिशोधन धांगड़(Dhangad)। कर्नाटक “काडू कुरुबा” के पर्याय के रूप में “बेट्टा-कुरूबा” । उत्तर प्रदेश के तेरह जिलों में गोंड को अनुसूचित जाति से हटाकर अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया और गोंड की पांच उपजाति (धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड) को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया ।


अनुसूचित जनजाति की परिभाषा क्या है


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(25) के अनुसार अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्रपति किसी भी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के विषय में राज्यपाल के सलाह के बाद सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा आदिवासी जाति या जनजाति समुदाय या इन आदिवासी जातियों और जनजाति समुदायों का भाग या उनके समुह के रूप में, जिन्हें इस संविधान के उद्देश्य के लिए राज्य/केंद्रशासित प्रदेश अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियां माना गया है, उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में परिभाषित करते है।


अनुच्छेद 342 क्या है


अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजाति की परिभाषा को परिभाषित की गई है तथा
342 धारा(1) में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी भी आदिवासी(जनजाति) या जनजाति समुदायों के भाग को या समूह को शामिल कर या उसमें से निकाल सकती है।


किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया


किसी समुदाय के अनुसूचित जनजाति के रूप में विशिष्टिकरण के लिए कई मानदंड बनाए गए है, जैसे – आदिम लक्षणों के संकेत, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बाहरी समुदाय से संपर्क में संकोच तथा पिछड़ापन। हालांकि इन मापदंडो का जिक्र संविधान में नही है, यह 1931 की जनगणना में समाविष्ट परिभाषाओं, प्रथम पिछड़ा आयोग 1955, लोकुर समिति, कालेलकर समिति 1965 और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 1967(चंदा समिति), 1969 की रिपोर्टो को शामिल करता है।
जनजातियों को ST की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया संबंधित राज्य सरकारों की सिफारिश से शुरू होती है, अनुसूची में शामिल करने के लिए कुछ शर्तें है। जिनके लिए संबंधित शोध संस्थानों के द्वारा राज्य सरकार निर्धारित विशेषताओं पर आधारित संस्कृति को जानने के लिए शोध अध्ययन करवाती है । शोध आधारित प्रतिवेदन राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। जिसे बाद में जनजातीय कार्य मंत्रालय को भेजा जाता है, जो समीक्षा करता है और अनुमोदन के लिए भारत के महापंजीयक को इसे प्रषित करता है। इसके बाद अंतिम निर्णय के लिए कैबिनेट को सूची भेजे जाने से पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की मंजूरी मिलती है।
सन 1960 में 225 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया गया था, जो कि 2022 में यह संख्या 750 के करीब हो गई है। जनगणना 2011 के अनुसार आदिवासियों की आबादी 10 करोड़ है जो कि कुल जनसंख्या की 8.6 फीसदी है।

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