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जब गैर आदिवासी महिला को पिता की संपति में अधिकार, तो आदिवासी बेटियों को क्यों नहीं

Posted on December 10, 2022 - 11:26 am by

आदिवासी महिलाओं को उत्तराधिकार देने के मामले पर सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर को केंद्र सरकार को इस मुद्दे को जांच करने और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन करने पर विचार करने का निर्देश दे दिया है. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक महिला आदिवासी बिना वसीयत उत्तराधिकार में पुरुष आदिवासी के साथ समानता की हकदार है.  शीर्ष अदालत ने कहा कि जब गैर-आदिवासी की बेटी अपने पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार है. तो आदिवासी समुदायों की बेटी को इस तरह के अधिकार से वंचित करने का कोई कारण नहीं है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता है.

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि जहां तक अनुसूचित जनजाति की महिला सदस्यों का संबंध है. उत्तरजीविता के अधिकार (किसी व्यक्ति के संयुक्त हित वाले व्यक्ति की मृत्यु पर संपत्ति का अधिकार) से इनकार करने का कोई औचित्य नहीं है.

“यह केंद्र सरकार द्वारा प्रश्न की जांच करने का निर्देश दिया जाता है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रदान की गई छूट को वापस लेने के लिए उचित और आवश्यक माना जाए. जहां तक ​​अनुसूचित जनजातियों के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों को लाना है उपयुक्त संशोधन है या नहीं.

भारत सरकार अनुच्छेद 14 और 21 तहत विचार करे

पीठ(Bench) ने कहा, “हमें आशा और विश्वास है कि केंद्र सरकार इस मामले को देखेगी और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता के अधिकार की गारंटी को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेगी.” एक आदिवासी महिला बिना वसीयत उत्तराधिकार में पुरुष आदिवासी के साथ समानता की हकदार है.

वर्तमान समय में पिता की संपति में पुत्री को लाभ नहीं देने को उचित नहीं ठहराया जा सकता

खंडपीठ ने  आगे कहा कि भारत के संविधान के 70 वर्षों की अवधि के बाद भी आदिवासी की बेटी को समान अधिकार से वंचित करने के लिए केंद्र सरकार के लिए इस मामले को देखने का सही समय है. जिसके तहत समानता के अधिकार की गारंटी दी गई है और यदि आवश्यक हो, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन करें. जिस हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम को अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं किया जाता है.

शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि एक अनुसूचित जनजाति बेटी को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत उत्तरजीविता के आधार पर अधिग्रहित भूमि के संबंध में मुआवजे में हिस्से की हकदार है. इसलिए जब तक हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) कायम है और इसमें कोई संशोधन नहीं है. तब तक पक्ष हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) के प्रावधानों द्वारा शासित होंगे.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के लागू होने के लगभग 70 से अधिक वर्ष बीत चुके हैं. पिता की संपत्ति में बेटी को उत्तरजीविता का लाभ कानून की दृष्टि से बुरा कहा जा सकता है और वर्तमान परिदृश्य में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है. जब तक कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) में संशोधन नहीं किया जाता है, पार्टियां अनुसूचित जनजाति के सदस्य हैं. जनजाति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2 (2) द्वारा शासित हैं.

क्यों उठ रहे हैं सवाल

दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता है.ऐसे में अनुसूचित जनजाति की बेटिंयां पिता की संपति में हकदार बनने से वंचित रह जाती हैं.

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