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जानिए, खेलो इंडिया यूथ गेम्स में कौन बनी झारखंड की आशा की किरण

Posted on February 6, 2023 - 5:52 pm by

झारखंड के गुमला जिले के नवाडीह गांव की आशाकिरण बारला ने एक बार फिर झारखंड को गौरवान्वित किया है. मध्य प्रदेश के भोपाल में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2023 में आशा ने 5 फरवरी को 800 मीटर की रेस में शानदार प्रदर्शन देते हुए दूसरे स्वर्ण पदक को अपने नाम की है. इसी आयोजन में दो दिन पूर्व यानी 3 फरवरी को उन्होंने 1500 मीटर की रेस में पहला स्वर्ण पदक हासिल की थी.

बता दें कि खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2023 का आयोजन 30 जनवरी से शुरू हुआ है जो 11 फरवरी तक चलेगा. इस आयोजन में आशाकिरण बारला ने अपने शानदार प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण पदक हासिल की है. आशा ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में कई स्वर्ण पदक जीती हैं. यही वजह है कि आशाकिरण झारखंड की गोल्डेन गर्ल के तौर पर पहचानी जाती हैं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भाग लेकर न सिर्फ झारखंड का, बल्कि पूरे देश का नाम भी रोशन किया है.

खेलो इंडिया में अपनी भागीदारी पेश करने के बाद फिलहाल आशा नेशनल कैंप में प्रशिक्षण के लिए बैंगलुरू में हैं. वह अब पेरिस ओलंपिक के लिए देश से चुने गए 2,024 संभावितों में शामिल हैं.

आसान नहीं रहा सफर

आशाकिरण आज जिस मुकाम पर हैं उस तक पहुंचने का सफर उनके लिए इतन आसान नहीं रहा. महज 13 साल की उम्र में आशाकिरण ने अपने पिताजी को खो दिया था. साल 2019 में उनके पिताजी के देहांत के बाद उनकी मां ने बिजली-पानी के लिए कई बार स्थानीय अधिकारियों से गुहार लगाईं, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. साल 2022 के सितंबर महिने में जब आशाकिरण ने भोपाल में आयोजित नेशनल यूथ एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीती थीं, तब घर में बिजली और टीवी नहीं होने से परिवार वाले अपनी बेटी को खेलते नहीं देख सके. पदक जीतने की खबर परिवार को पड़ोसियों ने दी थी.
हालांकि इसकी जानकारी मिलने पर गुमला के उपायुक्त सुशांत गौरव ने पहल करते हुए आशाकिरण के घर में टीवी लगवाया था.

सफलता संघर्ष मांगती है. आशाकिरण भी इससे अछूती नहीं रही. यूं कह लीजिए कि उनका संघर्ष कहीं अधिक ही रहा. परिवार की पूर्ति के लिए आशाकिरण की मां दिहाड़ी मजदूरी करने लगीं. हर दिन रास्ते चलते ट्रकों के सहारे उनकी मां घर से बाहर मजदूरी करने निकलती हैं और कभी कभार घर के सामने लगे सब्जी को लेकर साप्ताहिक हाट में जाकर बेच आती हैं.

आशाकिरण के परिवार में इस वक्त मां के अलावा बहन फ्लोरेंस बारला और एक भाई रहता है. उनकी बहन फ्लोरेंस भी धाविका हैं. पिता के जाने और मां को मजदूरी करता देख, आशा के कठिन परिस्थितियों का अंदाजा लगाया जा सकता है. इन सब मुश्किलों के बाद भी वह अपने प्रशिक्षण में कभी कमी नहीं आने दी. यही वजह है कि उनकी मेहनत उनके प्रदर्शन में साफ नजर आती है.

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