Skip to main content

ST (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा नही मिलने पर असम के 6 समुदाय नाराज क्यों हैं?

Posted on October 3, 2022 - 10:40 am by

विजय उरांव


असम के 6 समुदाय चुटिया, मटक, मोरन, ताई अहोम, कोच राजबंशी और टी ट्राईब ने लंबे समय से मांग की जा रही अनसूचित जनजाति (ST) दर्जा नही दिए जाने के बाद से केंद्रीय सरकार के प्रति गुस्से को जाहिर किया है। इन समुदायों के लोगों ने तीनसुकिया और ढिब्रूगढ़ जिले के विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री हिमंत विस्वा सरमा के पुतले जलाए गए।


दरअसल, 15 सितंबर गुरूवार को कैबिनेट की बैठक में केंद्रीय परिषद ने अनुसूचित जनजाति (ST) सूची को अपडेट करने का फैसला किया, इनमें छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश 12 जनजातियां और पांच उप जनजातियां शामिल है। इन समुदायों ने सरकार को अगाह किया कि अगर उनकी मांगों को और नजरअंदाज किया जाता है तो पूर्वोत्तर भारत में व्यापक आंदोलन करेंगे। कोच राजबंशी समुदाय के लोगों ने कहा कि अगर सरकार हमारी भावनाओं के साथ खेलती है तो आनेवाले दिनों में आर्थिक नाकेबंदी जैसी स्थिति देखने को मिलेगी। ऑल ताई अहोम स्टूडेंट यूनियन का कहना है कि असम सरकार के द्वारा नियुक्त एक समिति ने बहुत पहले एसटी का दर्जा के लिए निष्कर्ष प्रस्तूत किए थे लेकिन मामला आगे नही बढ़ा। जनवरी 2019 में जब राज्य ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आक्रोश देखा था, तत्कालिन जनजातीय मामलों के मंत्री जुआल ओराम ने असम के छह समुदायों को एसटी श्रेणी में शामिल करने के लिए राज्यसभा में एक विधेयक पेश किया था। हालांकि, बिल को वोट नहीं दिया गया और यह लैप्स हो गया।
ILAI (Indigenous lawyers Association of india ) ने इन 6 समुदायों को असम के एसटी लिस्ट में जोड़े जाने को लेकर आपत्ति जतायी है। बोड़ोलैंड जनजाति सुरक्षा मंच ने असम के छह समुदायों को एसटी दर्जा देने के केंद्र और राज्य सरकारों के कदम पर ILAI के द्वारा आपत्ति जताए जाने को सराहना की है। उनका कहना है कि इन समुदायों को संवैधानिक अधिकार दिए जाने पर मौजूदा असम की मूल जनजातियों के अधिकारों को नष्ट करेगी।


असम में जनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहे समुदायों की भारत में क्या है स्थिति

टी ट्राईब – असम में टी ट्राईब के नाम से जाने वाले 36 आदिवासी समुदाय विभिन्न राज्यों में अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज है, इन जनजातियों को अंग्रेजी हुकुमत के दौरान काम के लिए इन्हें यहां लाया गया था। ये जनजातियां मुंडा, हो, संताल, खड़िया, उरांव आदि है।


कोच राजबंशी – कोच राजबंशी जातीय समुह कभी एक नही थे, बल्कि ये अलग-अलग दो समुदाय है। पश्चिम बंगाल में कोच और राजबंशी को अलग-अलग रूप से अनुसूचित जाति समूह में रखा गया है। मेघालय में कोच तिब्बतों बर्मन भाषी के रूप में अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज है तथा राजबंशी सामान्य सूची में है (मेघालय में SC और OBC लिस्ट नही है)। तथा असम में भी कोच और राजबंशी OBC सूची में समुदाय अलग-अलग समुदाय थे लेकिन 1980 के दसक में अनुसूचित जनजाति दर्जा को लेकर हुई मांग के बाद से ‘कोच राजबंशी’ लिखने की शुरूआत हुई। 2011 में बैकवर्ड कमीशन ने कोच राजबंशी लिखने की इजाजत दे दी।
वहीं ताई अहोम, चुटिया, मोरन तथा मटक को मिश्रित समुदाय के रूप में होने की बात कही जाती है।

ताई अहोम – असम में ताई अहोम समुदाय की जनसंख्या करीब 13 लाख है तथा अपर असम के गोलाघाट, जोरहाट, सिबसागर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, लखिमपुर, सोनितपुर और दहेमाजी में रहते है। असम के OBC लिस्ट में शामिल है।

चुटिया – चुटिया समुदाय के बारें में दावा किया जाता है कि ये बोड़ो कछारी समुदाय से संबंध रखते है। इसकी जनसंख्या 20 से 25 लाख है। असम के उपरी तथा मध्य हिस्से के साथ अरूणाचल के कुछ हिस्सों में रहते है। चुटिया को OBC लिस्ट में रखा गया है।

मोरन – मोरन समुदाय की जनसंख्या 80 हजार के करीब है। यह समुदाय असम और अरूणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में रहते है।
भारतीय जनता पार्टी ने 2016 से पहले इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया था और इसके लिए राज्य सरकार के द्वारा एक कैबिनेट का उपसमिति का गठन भी किया था। इसके अलावा भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन मांगों को पूरा करने का वादा दो विधानसभा में किया था, हालांकि वादा पूरा करने में भाजपा असफल रही। अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद इन समुदायों को कई तरह के फाएदे मिल (आरक्षण और छुट) सकते है, जो वर्तमान में नही मिल रहे है।
असम के तिनसुकिया, सोनितपुर, नागांव, मोरीगांव, लखीमपुर, कामरूप, गोलपारा, धेमाजी, दरांग, बोंगाईगांव और चार बोड़ोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र जिलों में फैले 17 आदिवासी बेल्ट और 30 ब्लॉक है, उपरी असम के सादिया आदिवासी क्षेत्र में ताई-अहोम, मोरन, मटक और चुटिया लोगों को संरक्षित समूह घोषित किया गया है। सितंबर 2020 में, इन समुदायों को एसटी का दर्जा देने के बजाय असम राज्य विधानसभा ने मोरन, मटक और कोच-राजबंशियों के लिए स्वायत्त परिषद बनाने के लिए तीन बिल पारित किए. फिर 10 जुलाई, 2021 को, असम सरकार ने राज्य के स्वदेशी समुदायों की चिंताओं को दूर करने के लिए एक नए विभाग के निर्माण की घोषणा की।


भाजपा से आदिवासी समुहों ने सवाल किया कि टी ट्राईब को ST दर्जा दिलाने में क्यों असफल रही


सबरंगइंडिया’ के रिपोर्ट के अनुसार चाय जनजाति आदिवासी और आदिवासी समुदायों के वे सदस्य हैं जिन्हें अंग्रेजों द्वारा चाय बागानों में काम करने के लिए असम लाया गया था। आधुनिक चाय आदिवासियों के पूर्वज वर्तमान यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ से हैं। आजादी से पहले, उन्हें पूरे असम में 160 चाय बागानों में काम करने के लिए लाया गया था। उनमें से कई ने आजादी के बाद भी चाय बागानों में काम करना जारी रखा।

आजादी के बाद जब ये जनजातियां अपने गृह राज्यों में एसटी श्रेणी में आ गईं, तो असम में छोड़े गए परिवारों को “चाय जनजाति” के रूप में जाना जाने लगा। राज्य में उनकी गैर-स्वदेशी स्थिति के कारण उन्हें आरक्षण से बाहर रखा गया था। आजकल, असम में चाय जनजातियों से संबंधित 803 चाय बागानों में 8 लाख से अधिक चाय बागान कर्मचारी कार्यरत हैं, और चाय जनजातियों की कुल जनसंख्या 65 लाख से अधिक होने का अनुमान है। ये संथाल, कुरुख, मुंडा, गोंड, कोल और तांती जनजाति कई वर्षों से असम में एसटी का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं।

No Comments yet!

Your Email address will not be published.