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अपनी मां का मांस खाने वाली जनजाति को दर्शाती बंगाली कहानी से नागा आदिवासी क्यों हैं नाराज?

Posted on October 5, 2022 - 10:09 am by

बंगाली लेखिका देबरती मुखोपाध्याय ने अपनी लघु कहानी ‘भोज’ में लिखा है कि, नागालैंड में जेसुमी नाम का एक आदिवासी समुदाय अपनी बुढ़ी मां को मौत के घाट उतारता है और फिर उसकी आत्मा की शांति के लिए उसका मांस खाने की परंपरा का पालन करता है, उनका मानना है कि एक मां जो अपने गर्भ से बच्चे को दुनियां में लाती है, उसी बच्चे के अंदर जाकर खत्म हो जाना चाहिए।
इस कहानी का एक अंश 18 अगस्त को फेसबुक पोस्ट पर शेयर किया गया था। जिसे विरोध के बाद उसे हटा लिया गया। यह फिक्शन आधारित कहानी पहली बार 2017 में बंगाली पत्रिका नबाकलोल में प्रकाशित हुई और बाद में लघु कथाओं के संग्रह देबारतिर सेरा थिलर में इसे स्थान मिला। लेकिन अब देबरती मुखोपाध्याय के पोस्ट को लेकर ट्वीटर और फेसबुक पर कई नागा लोगों ने अपना गुस्सा जाहिर किया है। वह नागाओं के नस्लवादी के रूप में चित्रण की आलोचना कर रहे है।
लेखिका ने अपने बचाव में कहा कि भोज एक लघु कहानी है। जो 2017 में लिखी गई थी। दो दोस्तों की यह कहानी एक काल्पनिक स्थान पर एक काल्पनिक जनजाति के बारें में है। मैंने किसी वास्तविक नाम या रीति-रिवाजों का उल्लेख नहीं किया है।
मुखोपाध्याय ने आगे कहा कि जगहों पर आधारित कई वेब सीरीज/फिल्में और किताबें है। अगर उनमें कोई राजस्थान में की गई हत्या का जिक्र करता है तो इसका मतलब राजस्थान को बदनाम करना नहीं है। उनके अनुसार शोसल मीडिया पर कुछ नागाओं को यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि जेसुमी नागालैंड के शहर चिज़ामी को रिप्रजेंट करता है। यह एक काल्पनिक बंगाली शब्द है। जिसमें काल्पनिक चाखेसांग जनजाति का जिक्र है।
देबरती ने अपने एक पोस्ट में नागालैंड के लोगों को पूरी तरह से अंजाने में चोट पहुंचाने के लिए माफी मांग ली है। और अगले संस्करण में नागालैंड नाम को बदलने की बात कही है।

अपनी लघु कहानी के लिए प्रेरणा के बारे में बताते हुए मुखोपाध्याय ने फेसबुक पर लिखा है कि एक बुजुर्ग मजदूर से वह पांच साल पहले नागालैंड में मिली थी, ने उसे ‘अजीब परंपरा’ के बारे में बताया था।

स्क्रीनशॉट का पहला हिस्सा
देबरती के फेसबुक से ली गई स्क्रीनशॉट का दूसरा हिस्सा

इस परंपरा का पालन एक जनजाति द्वारा किया जाता है जो आत्मा के संरक्षण में विश्वास करती थी। जिस तरह से हम दुनिया में मां के गर्भ से आते हैं, उनकी मृत्यु के बाद वे मां का मांस खाते हैं ताकि उसकी आत्मा उसके बच्चे के भीतर रह सके। यह एक काल्पनिक लोककथा है। मैंने काल्पनिक विवरण का इस्तेमाल करके अवधारणा लिखी है।

मुखोपाध्याय के अनुसार किसी बुजुर्ग व्यक्ति ने उन्हें बताया था कि 70 के दशक से पहले ही इस परंपरा का पालन किया जाना बंद कर दिया गया था। लेकिन वह नागा व्यक्ति के साथ लोककथा को सत्यापित नहीं कर सकी। मैं तब एक युवा लेखिका थी और मुझे नहीं पता था कि पांच साल बाद इस तरह का मसला उठ खड़ा होगा मैंने इन सालों में काफी कुछ सीखा है और पहले से ज्यादा परिपक्व हो गई हूं।


लोगों की प्रतिक्रिया

लेखक डॉली किकों ट्विटर पर लिखते हैं कि नागा लोगों को आदमखोर वाला स्टीरियोटाइप बनाना और आपत्ति जताने पर काल्पनिक कह जस्टिफाई करना। इस तरह लेखक का नागालैंड के लिए प्यार मुझे सरदर्द दे रहा है।

वहीं तंगम रीना इसे घृणित, अस्वीकार्य और बीमार करने वाला बताती है।

इसे नितिन सेठी एक उस नस्लवाद की तरह बताते है जो किसी भी पैकेजिंग पेपर या शब्दों में लिपटा हुआ अभी भी उतना ही कच्चा और सड़ा हुआ है। गंध को सूंघना आसान है।

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