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हिजला मेला का उद्घाटन करने से क्यों डरते हैं राजनेता?

Posted on February 25, 2023 - 5:45 pm by

प्रसिद्ध राजकीय मेला यानि हिजला मेला का वार्षिक आयोजन 24 फरवरी से शुरू हो गया है. यह मेला झारखंड के दुमका जिले में हर साल माघ-फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में लगता है. जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं. इस बार भी बहुत धुम-धाम से सिंगा-सकवा, मांदर व मदानभेरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के साथ मेले को आयोजित किया जा रहा है, जो तीन मार्च तक चलेगा.

जनजातीय हिजला मेला दुमका के मयूराक्षी नदी जो कि त्रिकुट पर्वत से निकलती है, उसके तट पर और हिजला पहाड़ की ढलान पर लगता है. यह पूरा इलाका प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है, जो मेले की खूबसूरती को और निखारता है. इस मेले से संथाल परगना की सभ्यता, संस्कृति के आकर्षक विरासत को देखने और समझने का अवसर मिलता है. इसमें शामिल होकर तरह-तरह के पारंपरिक प्रदर्शनी, नृत्य-संगीत की प्रस्तुति, कला प्रदर्शन आदि गतिविधियों का भरपूर आनंद लिया जा सकता है.

बता दें कि हिजला मेला का शुरुआत वर्ष 1890 में तत्काल संथाल परगना के उपायुक्त जॉन राबटर्स कास्टेयर्स के समय की गई थी. उपायुक्त कास्टेयर्स ने ही इस ऐतिहासिक मेले की नींव रखी थी. मेले के आयोजन के पीछे कास्टेयर्स का उद्देश्य बताया जाता है कि स्थानीय परंपरा और रीति-रिवाज को मंच प्रदान करने के जरिये आदिवासियों से सीधा संवाद स्थापित करना था. ताकि उन्हें आदिवासियों को जानने और समझने में आसानी हो सके और उनके साथ अच्छे संबंध स्थापित हो सके.

वहीं इस मेले से संबंधित एक भ्रम भी काफि फैली हुई है. एक समय था जब हिजला मेले के उद्घाटन समारोह में झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों के मंत्री-नेता, अधिकारी, पदाधिकारी आदि लोग फीता काटने के लिए तत्पर रहते थे. तीन दशक पहले तक राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी शामिल हुआ करते थे. इसके बाद एक भ्रांती तेजी से फैलने लगी की उद्घाटन करने से राजनेताओं की कुर्सी चली जाती है. तब से लेकर कोई राजनेता या अधिकारी मेले का फीता काटकर उद्घाटन नहीं करते हैं. मेले का उद्घाटन अब ग्राम प्रधान द्वारा किया जाता है.

हिजला मेले की बढ़ती प्रसिद्धि के कारण वर्ष 1975 में संताल परगना के तत्कालीन उपायुक्त गोविंद रामचंद्र पटवर्धन की पहल पर हिजला मेला के आगे जनजातीय शब्द जोड़ दिया गया. झारखण्ड सरकार ने इस मेला को वर्ष 2008 से एक महोत्सव के रुप में मनाने का निर्णय लिया. वहीं वर्ष 2015 में इस मेले को राजकीय मेला का दर्जा मिला, जिसके बाद यह मेला राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के नाम से जाना जाने लगा. बता दें कि कोरोना काल के दौरान अन्य वार्षिक आयोजनों की तरह दो वर्ष हिजला मेला के आयोजन में भी सन्नाटा छाया रहा था.

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