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अन्य भारतीयों की तुलना में आदिवासी अधिक कुपोषित क्यों?

Posted on October 5, 2022 - 1:35 am by

स्वतंत्रता के बाद से भारत में कई सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों द्वारा आदिवासी समुदायों की आजीविका, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करके उन्हें विकसित करने का प्रयास किया गया, छह दसकों के विशेष उपायों के बावजूद आज भी आदिवासी भारत में सबसे अधिक कुपोषित है।
न्यूट्रिशन इंडिया इंफो के आंकड़ो के अनुसार भारत में 47 लाख आदिवासी बच्चे पोषण भीषण कमी से पीड़ित है, जो उनके जीवित रहने, विकास, सीखने, स्कूल में प्रदर्शन और व्यस्कों के रूप में उत्पादकता को प्रभावित कर रहा है।
50 लाख गंभीर रूप से कुपोषित आदिवासी बच्चों के लगभग 80 फीसदी सिर्फ आठ राज्यों कर्नाटक, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उड़िसा से है। भारत के पांचवीं अनुसूची में दर्ज इन राज्यों तथा अन्य राज्यों के आदिवासी को भूमि के हस्तांतरण, विस्थापन और अपर्याप्त मुआवजे का सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ा है।

आदिवासियों में पोषण की कमी से अधिक बौनापन

वहीं पांच वर्ष की आयु से कम के आदिवासी बच्चों में से लगभग 40 फीसदी बच्चे बौने (स्टंटेड) है और उनमें से 16 फीसदी गंभीर रूप से बौने(स्टंटिंग) है। कम एवं मध्यम स्तर का बौनापन आदिवासी और गैर-आदिवासी बच्चों में समान है। लेकिन गैर-आदिवासी बच्चों(CNNS 2016-18) की तुलना में आदिवासी में गंभीर बौनापन है, जहां गैर आदिवासियों में 9 फीसदी है तो आदिवासियों में 16 फीसदी है।
सामाजिक एवं आर्थिक रूप से उन्नत वर्गों के बच्चों की तुलना में आदिवासी बच्चों में कुपोषण का स्तर अधिक है। आदिवासी लोगों की आय सुरक्षा, उत्पादक संसाधनों कों होने वाले नुकसान (खराब मुआवजा के साथ वन या कृषि भूमि के अधिकार) और उन तक पहुंच से प्रतिकूल रूप में रूप से प्रभावित हुई है। उनके लिए ऋण ही इससे निदान की मुख्य रणनीतियों में से एक है, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावित लोगों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में प्रयास किया गया है कि जंगल में मिलने वाले फलों और सब्जियों को पुनः उपयोग में लाया जाये जिससे आहार विविधता में सुधार हो सके।

बच्चों में कुपोषण के क्या कारण है

माताओं में कुपोषण का होना जन्म लेने वाले बच्चों में कुपोषण का होना मूल कारण है। बच्चों को जन्म देने के दो-तीन दिन तक कुपोषण के कारण आदिवासी माओं में दूध का स्त्रवण नही होता है। यही से कुपोषण का चक्र शुरू होता है। खुले में शौच के कारण फैली बीमारी से भी इसका असर होता है। वनाधिकार से दूर होने के कारण वहां से मिलने वाले पौष्टिक जड़, कंद, फल, शहद, मोटे अनाज का प्राप्त न होना। इससे खानपान का आदत पुरी तरह से बदल चुका है।

आर्टिकल स्त्रोत : यूनिसेफ इंडिया

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