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मध्यप्रदेश में आदिवासी बसानिया बांध परियोजना का क्यों कर रहे हैं विरोध

Posted on February 6, 2023 - 4:03 pm by

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहूल क्षेत्र बसानिया के आदिवासी बांध बनाने को लेकर महीनों से विरोध कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि घुघरी तहसील के ओढारी गांव में नर्मदा नदी पर बांध बनने से 31 गांवों को पानी में डूबने की आशंका है. इससे लगभग 2700 परिवारों को उस इलाके का सब कुछ छोड़कर दूसरी जगह विस्थापन किए जाने का अनुमान है. इस मामले पर बसानिया ओढारी बांध विरोधी संघर्ष समिति बांध के निर्माण को रोकने के लिए हर मुमकिन प्रयास कर रही है.

इलाके के आदिवासियों ने सरकार और बांध के निर्माण के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है. आदिवासी समूहों को अपनी आजीविका के संकट का भी भय है. विरोध कर रहे ग्रामीणों ने सूबे के मुख्यमंत्री को जिला कलेक्टर के ऑफिस में ज्ञापन भेजा है. जिसमें सरकार ने साल 2021 में विधानसभा सदन में कहा था कि इस बांध पर रोक लगाई जाएगी. ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी हाल में बसनिया बांध का निर्माण नहीं होने देंगे.

क्या है बसानिया बांध प्रोजेक्ट?

बसानिया बांध परियोजना एक 100 MW जल विद्युत परियोजना है. इस बांध परियोजना की घोषणा साल 2012 में की गई थी. इसके साथ इस इलाके में दो और बांध भी प्रस्तावित है. यह बांध मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी बेसिन पर योजनाबद्ध है. परियोजना का निर्माण 2024 में शुरू होने की संभावना है और 2026 में वाणिज्यिक संचालन में प्रवेश करने की उम्मीद हैं. 3700 करोड़ की लागत से बनने वाली बसानिया बांध से 8780 हैक्टेयर में सिंचाई और 100 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन होना प्रस्तावित है. इस बांध से 18 गांव मंडला और 13 गांव डिंडोरी जिले के प्रभावित होने वाले है. बांध में कुल 6343 हैक्टेयर जमीन डूब में आएगी. जिसमें 2443 हैक्टेयर निजी भूमि, 1793 हैक्टेयर शासकीय भूमि और 2017 हैक्टेयर वन भूमि शामिल है.

पूर्व बांध परियोजनाओं से आदिवासियों को चुकाना पड़ा कीमत

बरगी बांध, जिसे रानी अवंती बाई सागर सिंचाई परियोजना के रूप में भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी पर बनने वाला पहला प्रमुख जलाशय था. इससे 4.37 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 105 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन की उम्मीद थी. नर्मदा नदी पर जल आपूर्ति के लिए बरगी बांध जो कि नर्मदा नदी पर बनने वाले 30 प्रमुख बांधों की श्रृंखला में से एक था उसमे हजारों लोग विस्थापित किए गए थे.

सरकारी रिकॉर्ड और पुनर्स्थापित गांवों के निवासियों के साक्ष्य दिखाते हैं कि सरकार ने न केवल उनके विस्थापन के समय लोगों के पुनर्वास को नजरअंदाज किया, बल्कि 34 वर्षों तक उन्हें लगभग भूल भी गया. अब मंडला और डिंडोरी जिले के आदिवासी समुदाय को भी इसी बात का डर सता रहा है कि सरकार उनको विस्थापित करने के बाद भूल जाएगी.

भारत में हीराकुंड, भाखड़ा, और कई अन्य बांध परियोजनाओं से विस्थापित हुए आदिवासी अभी भी परियोजना के चालू होने के समय उनसे किए गए वादे के मुताबिक मामूली मुआवजा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. महिलाओं के लिए ग्राम्य संसाधन केंद्र द्वारा किया गया एक अध्ययन भारत में बांध परियोजनाओं से संबंधित मुआवजे के टूटे वादों के कई समान उदाहरण प्रदान करता है. बरगी बांध के अधिकांश विस्थापित किसानों ने उस पैसे से रिक्शा खरीदे हैं और अन्य बड़ी बांध परियोजनाओं के विस्थापितों में से कई मजदूर बन गए हैं.

हीराकुंड बांध के विस्थापितों का भी कुछ ऐसा ही अनुभव है. सांस्कृतिक उत्तरजीविता की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि कई विस्थापितों को पर्याप्त भूमि नहीं दी गई है. कई अन्य को खंडित या भारग्रस्त भूमि दी गई है. अधिकांश साइटों में पर्याप्त पेयजल या स्वच्छता या स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं. किसी भी पुनर्वास स्थल में चारागाह, चारा या जलाऊ लकड़ी की सुविधा नहीं है.

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