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बांग्लादेश की पहाड़ी जनजातियों ने भारत से क्यों मांगा समर्थन?

Posted on January 28, 2023 - 12:33 pm by

भारत, बांग्लादेश और म्यांमार में रहने वाले चिन-कुकी-मिज़ो समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक संगठन ने भारत से समर्थन मांगी है. उनका कहना है कि बांग्लादेश के चटगाँव हिल ट्रैक्ट्स (CHT) में रहने वाले जातीय अल्पसंख्यकों के साथ बांग्लादेश सरकार अत्याचार और उनके मानवाधिकारों का हनन कर रही है. जिसमें बांग्लादेश की सेना द्वारा रोहिंग्या मुस्लिम चरमपंथी समूह, अराकान आर्मी की मिलीभगत से एक कथित हमले के बाद नवंबर 2022 से चिन-कुकी-मिज़ो समूह से जुड़े 300 से अधिक लोगों ने मिजोरम(भारत) के लॉन्गतलाई जिले में शरण लेना पड़ा है.

दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के खगराचारी, रंगमती और बंदरबन जिलों वाला 13,000 वर्ग किमी का पहाड़ी और वन क्षेत्र, सीएचटी भारत के मिजोरम और त्रिपुरा राज्यों और म्यांमार के चिन और रोहिंग्या-बसे हुए रखाइन राज्यों की सीमा से लगा हुआ है. जो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन(ZORO) ने प्रधानमंत्री को दिए एक ज्ञापन में कहा है कि बांग्लादेश की सेना सदियों से सीएचटी में रह रहे बावम, पंगखुआ, लुशाई, खुमी, मरु या मिरिया और खियांग जैसे कुकी- चिन जनजातियों के संवैधानिक और मानवाधिकारों को एक नीति के तहत खत्म किया जा रहा है.

सीएचटी(चटगांव हिल्स ट्रैक्स) का इतिहास

पूर्व-ब्रिटिश सीएचटी में स्वशासी मुखिया और सरदारियां थीं. ZORO  के अध्यक्ष आर. सांगकाविया ने कहा कि आबादी को या तो नदी के किनारे रहने वाली ख्यौंगथा, या तोंगथा, पहाड़ियों के घने जंगलों में रहने वाली जनजातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया था. जोरो संगठन ने कहा कि जनजातियां हिंदू राजाओं और मुस्लिम नवाबों के दायरे से बाहर रहीं, लेकिन 1860 में अंग्रेजों द्वारा सीएचटी के कब्जे ने उन्हें बाहरी दबावों के प्रति संवेदनशील बना दिया.

ज़ोरो ने कहा कि अंग्रेजों ने जनजातियों की पहचान, रीति-रिवाजों, संस्कृति, परंपरा और पैतृक भूमि की रक्षा के लिए सीएचटी को विशेष संवैधानिक दर्जा दिया. हालाँकि, प्रतिबंधात्मक कानूनों को 1903 तक निरस्त कर दिया गया था, ताकि मैदानी इलाकों के निवासियों को हाइलैंडर्स के क्षेत्रों में घुसपैठ करने दिया जा सके. आदिवासियों अपेक्षाओं के विपरीत 1947 में सीएचटी का पाकिस्तान में विलय कर दिया गया. सभी स्वदेशी जनजातियों को जीवन के सभी पहलुओं में भेदभाव का सामना करना पड़ा.

आदिवासियों की जमीन पर अतिक्रमण

संगठन ने कहा कि सीएचटी की जनजातीय आबादी में भारी गिरावट आई है, लेकिन बांग्लादेश सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर जनजातियों विशेष रूप से कुकी-चिन लोगों की पैतृक भूमि पर अतिक्रमण किया गया. पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर गैर-आदिवासी लोगों की आ जाने के कारण सीएचटी की कुकी-चिन जनजाति एक अलग राज्य की मांग कर रही है. लेकिन बांग्लादेश सरकार ने अपने दमनकारी उपायों को आगे बढ़ाने का फैसला किया. जिसके नए उदाहरण बांग्लादेश सेना द्वारा कुकी-चिन नेशनल आर्मी (केएनए) के खिलाफ अराकान सेना के माध्यम से प्रॉक्सी वार किया गया.

भारतीय हस्तक्षेप की मांग

जोरो ने ढाका की कार्रवाई को आदिवासियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा का स्पष्ट रूप से उल्लंघन बताया है. ज़ोरो ने मोदी से अपने बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना को केएनए के साथ संघर्ष विराम की घोषणा करने और CHT में कुकी-चीन के अधिकारों का दुरुपयोग बंद करने की सलाह देने के लिए कहा.

इसके साथ संगठन ने पीएम मोदी से गृह मंत्रालय और सीमा सुरक्षा बल को निर्देश देने की भी अपील की कि वे कुकी-चिन लोगों को न भगाएं जो बांग्लादेश से भाग रहे हैं और मिजोरम में अपने “रक्त से संबंधित जनजातियों” के बीच शरण ले रहे हैं.

कौन है कुकी चिन जनजातियां

म्यांमार के चिन, मिजोरम के मिजो और बांग्लादेश के कुकीज आदि सभी कुकी जातीय समुदाय के वंशज हैं. इन समूहों को जो कहा जाता है. चिन-कुकी बांग्लदेश के चितागोंग हिल्स ट्रैक के रहने वाले हैं. जो कि बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में है. इसकी सीमाएं दक्षिण-पूर्व में म्यामार, उत्तर में त्रिपुरा, पूर्व में मिजोरम और चितागोंग जिला पश्चिम में पड़ता है.

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