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बस्तर के आदिवासी क्यों देते है देवी देवताओं को सजा?

Posted on September 28, 2022 - 8:00 am by
  • जो देवता भक्तों के कसौटी पर खरा नही उतरता उसे सजा दी जाती, या गलती सुधारने का मौका दिया जाता है
  • बस्तर क्षेत्र के प्रत्येक देवी-देवताओं को अदालत में हाजिर होना पड़ता है

सदियों से अपनी समस्या के लिए ग्राम देवताओं को पूजा करने वाले आदिवासी देवताओं के द्वारा उनका काम नही करने पर देवी-देवताओं को अदालत ले जाते है, जहां पर अपराध की सजा मंदिर से छ: माह तक निष्कासन के अलावा मृत्यु दंड तक दी जाती है। मृत्यु दंड में मूर्तियों को खंडित किया जाता है।

बस्तर की देवियों का अपना अलग महत्व है

                                                            
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में कई देवी देवता है, जिनकी पूजा वहां के आदिवासी करते हैं, देवियों में केशरपाल की केशरपालीन, बस्तर की गंगादाई, गढ़मधोता की महिषासुर मर्दिनी, आमापाल की आमाबलिन, लोहड़ीगुड़ा की लोहड़ीगुड़ीन, बेड़ागांव की हिंगलाजीन, कोंडागांव की दाबागोसीन, बनियागांव की दुलारदाई प्रमुख है। बस्तर क्षेत्र की देवियों में बारसूर में पीलाबाई का अलग प्रताप है। नारायणपुर में मावलीमाता, तेलीनघाट मुंडीन में तेलीन सती, बैलाडीला घाट की बंजारिन, दरभाघाट की बंजारिन माता को आदिवासी पूजते हैं। केशकाल की गोबारिन जिसे गोंडिन देव भी कहा जाता है। जिसके सती होने की कथा बस्तर में प्रचलित है।

बस्तर में दंतेश्वरी देवी और आंगादेव की मान्यता लोकव्यापी है। काकतीय वंश के साथ दंतेश्वरी देवी प्रतिष्ठित हुईं जो बड़े डोंगर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर में विराजमान हैं। बस्तर के मड़िया, मुरिया, भतरा, परजा, गोड और नागवंशीय आदिवासी मूलतः दंतेश्वरी माई और आंगादेव के अन्नय भक्त हैं। उनके यहां हिन्दू देवी-देवताओं को पूजा जाता है। लेकिन बूढ़ी माता के लिए सुअर और मुर्गा चढ़ाया जाता हैं। माना जाता है कि बूढ़ी माता चेचक और पशुओं को रोग मुक्त रखती है।

बस्तर की ग्राम देवियां


चेचक से मुक्ति देने वाली बूढ़ी माता लोक मान्यता से जुड़ी हैं। तेलगिन माता और परदेसिन माता आदि इनकी सात बहनें है सबकी पूजा होती है। परजा आदिवासी माटी माता (धरती) की पूजा को विशेष महत्व देते हैं। इसे वे वैदिक पूजा के अन्तर्गत मानते हैं। जगदलपुर जिले की गड़बा आदिवासी समुदाय ठाकुराइन माता को पूजती है। इनकी सात बहनों की भी पूजा होती है लेकिन लंगूरदेवी, दंतेश्वरी और तेलगिन माता की पूजा यह जाति नहीं करती। वर्तमान में सभी जातियां दंतेश्वरी माई की पूजा करती है।

वन प्रकृति में देवियों का वास


बस्तर के सघन वनों के बीच बसे गांवों में देवी देवताओं की स्थापना का विशेष महत्व है। हर गांव में कम से कम पांच देवियां विद्यमान रहती हैं। सभी देवियों की पूजा का अपना विधान और समय भी अलग-अलग होता है। देवी-देवताओं के नाम आदिवासियों की अपनी भाषाओं में है। विशेष चर्चा में जो देवी-देवता हैं उनके नाम इस प्रकार है, गंगादेई, लिंगादेई, बस्तरीन, दुलादेई, सोनादेई, लाहुरी, बोहरयत, परदेशीन माता, तपेश्वरीन, पेंर्ड्रबडीन, कंकालीन, भंगाराम (केसकाल) भैरमदेव, पाटदेव, उलटभैरम, भीमासन, भीमादेव, चंदर, सुहूर (माता का सेवक) मावलीमाता, हिंगलाजिन, बंगारिन माता, शीतला माता, चौरयामाता, वासुगायता माता, बूढ़ी परदेशीन, कोटगोड़िन माता, नागा भीम, नागा भैरम, डोंगरदेव, डोकरादेव, राउड़, राजा राउड़, दीवान राउड़, रानी राउड़ डांढ, पंडीरराम, सिंगा साव, उलटराव, सिंगराय, सकनीराय, चीतराराय, कमनी (पानी के देव) गयादेव, गयागोरिन, गंडिनमाता, आदि हैं।

बलि प्रथा की परंपरा


प्राचीन बस्तर की आदिवासी शिकार कर अपना भरण-पोषण करती थीं। आदिवासी शिकार करने के बाद देवियों का भोग लगाते थे। देवी मंदिरों में भैसा, बकरा की बलि दिए जाने को परंपरा रही है। खास तौर पर मावली मंदिरों में बलि प्रथा प्रचलित थी। जगदलपुर के अलावा कई स्थानों में मावली देवी के मंदिर मिलते हैं।  बताया जाता है कि 10 से 13वीं शताब्दी के बीच बस्तर के नागवंशीय राजाओं ने कई मंदिरों का निर्माण कराया था। जिसमें नागवंशीय राजाओं की प्रमुख आराध्य मणिकेश्वरी देवी थी। वहीं 13वीं शताब्दी में काकतीय वंश के राजाओं ने बस्तर में सत्ता संभाली और दंतेश्वरी देवी का मंदिर राजा अन्नमदेव ने बनवाया। दंतेश्वरी देवी राज्य की प्रधान देवी और राजा उनके पुजारी बने रहे।

देवी की अदालत जहां देवी-देवताओं को सजा दिया जाता है


बस्तर क्षेत्र के प्रत्येक देवी-देवताओं को अदालत में हाजिर होना पड़ता है। कांकेर में चारभाठा की दंतेश्वरी देवी 22 गांवों की तहसीलदार मानी जाती है। हर वर्ष की कार्तिक अमावस्या के बाद के पहले सोमवार को दंतेश्वरी देवी के दरबार में मेला भरता है और जन सुनवाई होती है। दंतेश्वरी देवी अपने दीवान भंगाराम देवी के माध्यम से देवी-देवताओं को दंड भी देती है। दंड के भागी देवों की पूजा बंद करा दी जाती है। किसी देवी देवता को क़ैद कर दिया जाता है। केशकाल में विराजी देवी भंगाराम की अदालत में बस्तर के देवी-देवता आते हैं। हर वर्ष भादो जात्रा में उत्सव मनाया जाता है। जो देवी देवता भक्तों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता उन्हें भंगाराम देवी सजा देती है। जहां देवताओं को अपनी गलतियां सुधारने का मौका दिया जाता हैं। गलतियां सुधारने के बाद देवियों को फिर से मंदिर में स्थापित किया जाता है। बस्तर के आदिवासी लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। जिन्हें वे अलग अलग स्वरूपों में पूजकर अपनी जीवन चर्या में सहेजते भी हैं। बस्तर का प्राकृतिक वैभव,  वहां की मनोरम वन प्रकृति, कल कल बहती नदियां, तो हरहराते हुए झरने यहां की सुरम्य वादियों को और भी मनमोहक बनाते हैं। समूची प्रकृति को पूजने वाले बस्तर के आदिवासी इनके रखवाले हैं जो अपनी परंपरा, संस्कृति और जीवन के हर मोड़ पर अपने देवी-देवताओं की आस्था लिए हुए चलते हैं।

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