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ट्वीटर पर क्यों ट्रेंड कर रहा है आदिवासी धर्मकोड की मांग?

Posted on October 15, 2022 - 8:27 am by

ट्वीटर पर आदिवासी धर्मकोड को लेकर ट्रेंड चलाया जा रहा है, भारत में आजादी के बाद से ही आदिवासियों के द्वारा जनगणना में आदिवासी धर्म को लेकर कॉलम की मांग की जा रही है. इसको लेकर पिछले दिनों 30 सितंबर को कोलकाता में सरना धर्म कोड को लेकर एक जनसभा हुई थी. 2021 में झारखंड के विधानसभा में सरना आदिवासी धर्म कोड को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था तथा हार्वड युनिवर्सिटी के एक कॉफ्रेंस में 21 फरवरी 2021 को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा था कि “आदिवासी कभी हिंदू नहीं थे, न हैं, इसमें कोई कंफ्युजन नहीं है. हमारा सबकुछ अलग है, इसी वजह से हम आदिवासी में गिने जाते हैं. हम प्रकृति पूजक है.” 

राजस्थान विधानसभा में डूंगरपुर विधायक गणेश घोघरा ने आदिवासी 9 मार्च 2021 को आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग करते हुए कहा था कि हमारा आदिवासी धर्म अलग है, हमारी संस्कृति, परंपरा व रीति रिवाज अलग है, हम प्रकृति को पूजते हैं। हिंदू के नाम पर हमारा शोषण हो रहा है, हमारा आदिवासी धर्म कोड अलग से दर्शाया जाए।

वहीं 11 अगस्त 2021 को राजमहल सांसद विजय हांसदा ने लोकसभा में सभी आदिवासियों को मिलाकर एक युनिक धर्मकोड की बनाने की मांग की थी, जिसके जवाब में कहा गया था कि यह संभव नहीं है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में आदिवासी अपने-अपने धर्मकोड की मांग कर रहें हैं.

क्या है आदिवासी धर्मकोड का इतिहास

ब्रिटिश भारत के जनगणना में 1871 से 1940 तक आदिवासियों के लिए अलग धर्मकोड के रूप में लिखा जाता रहा है, जिसमें 1871 में Aborigines, 1881 व 1891 में Aboriginal, 1901, 1911 व 1921 में Animist, 1931 में Tribal Religion, 1941 में Tribes तथा 1951 में Schedule Tribe.

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आयुक्त रहे डॉ वेरियर एलविन, श्री यु. एन. वेबर व लक्ष्मीदास की आलोचना करते हुए सांसद रहे स्व. कार्तिक उरांव कहा था कि जनजाति(आदिवासी) की कल्याण की भावना को ही त्याग दिया था इसलिए जनजातियों की परिभाषा नही दी, इसलिए आदिवासियों के धर्म कोड की अनदेखी की गई।  

ट्वीटर ट्रेड में क्या कह रहें हैं लोग

ट्वीटर पर ट्राईबल आर्मी के हंसराज मीणा ने आदिवासी धर्मकोड के मुद्दे को उठाते हुए लिखा है कि क्या आपने भारत का संविधान पढ़ा है? क्या आपकों संविधान में लिखा मिला है कि आदिवासी किसी धर्म का मूल हिस्सा है? जब संविधान में आदिवासी हिं’ दु, ई’साई या अन्य धर्म में वर्णित लिखित सम्मिलित नहीं तो उन्हें पृथक आदिवासी कॉलम क्यों नहीं मिलना चाहिए? समर्थन करें। #आदिवासी_जनगणना_कॉलम_दो

ट्वीटर यूजर नन्दराम डोंगरे ने 15 अक्टूबर 2022 को 11:48 बजे ट्राइबल आर्मी के ट्वीटर पोस्ट पर चलाए गए ट्रेंड #आदिवासीजनगणनाकॉलम_दो पर कॉमेंट कर कहा-

मैं आप लोगों के समर्थन में खड़ा हूं। निश्चित ही आदिम समुदाय को उनके पारंपरिक धर्म कोड मिलना ही चाहिए

ट्वीटर यूजर नरेश सिंह ने 9:41 बजे कॉमेंट कर भारत में 1871 से लेकर 1951 तक के आदिवासियों का जनगणना में कॉलम होने का हवाला देते हुए बताया कि-

1871 में अबोर्गीन्स, 1881 में अबोरीजनल, 1891 में अबोरीजनल, 1901 में अनिमिस्ट, 1911 में अनिमिस्ट, 1921 में अनिमिस्ट, 1931 में ट्राइबल रिलिजन, 1941 में ट्राइब्स और 1951 में सेड्यूल्ड ट्राइब्स से कॉलम थे।

https://twitter.com/NareshSingh__/status/1581135615776591874?s=20&t=DNY1IQ29-XL4u8rz1-482Q

अन्य यूजर राजकुमार मीना ने कॉमेंट कर कहा, हम भारत के मूलनिवासी हैं और 1931 का भारत का जनगणना का हवाला दिया।

https://twitter.com/RajkumarMeena_/status/1581135850477219840?s=20&t=DNY1IQ29-XL4u8rz1-482Q