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नाइजीरिया के योरूबा ट्राइबल मार्क क्यों कर रहा है ट्रेंड

Posted on February 1, 2023 - 4:46 pm by

नेहा बेदिया, ट्राइबल खबर के लिए

आदिवासी परंपरा, संस्कृति और सभ्यता के बारे में चाहे कितना ही जानने की कोशिश की जाए कम ही लगता है. आए दिन दुनिया भर में अक्सर नए और आकर्षक प्रथाएं देखने को मिलती हैं. हालांकि हमारे जानकारी में यह पहली बार होता है तो हम इसे नया मानते हैं, लेकिन उन आदिवासियों के लिए ये प्रथाएं आम होती हैं जिन्हें वे काफी समय से आचरण में रखते हैं.

ऐसा ही आकर्षक और कई सवाल करने पर मजबूर करने वाला एक आदिवासी प्रथा उल्लेख में आई है. नाइजीरिया देश के योरूबा आदिवासियों में अपने चेहरे की तव्चा को दाग कर स्थाई निशान बनाते हैं. जो सुनने में बेहद दर्दनाक लगता है, पर समय बीतने के साथ ये निशान योरूबा आदिवासियों के पहचान और सौंदर्यीकरण का एक मूल हिस्सा होता है.  

दरअसल योरूबा संस्कृति में, बचपन के दौरान त्वचा को जलाकर या काटकर शरीर पर आदिवासी निशान अंकित किए जाते हैं. ये निशान शरीरे के किसी भी हिस्से में हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर चेहरे पर होते हैं. ये निशान मुख्य रूप से सुंदरता के संकेत के रूप में और किसी व्यक्ति की जाति, परिवार या पितृसत्तात्मक विरासत की पहचान करने के साधन का काम करते हैं. यह एक समूह को दूसरे से अलग करने का भी कार्य करता है.

कौन हैं योरूबा और क्या है इनकी प्रथा

योरूबा जिसे उच्चारण में जोरूबा भी कहते हैं, अफ्रीका का एक आदिवासी समूह है जो पश्चिमी अफ्रीका में रहते हैं. इनकी आबादी कुल मिलाकर 42 मिलियन के करीब है. जिसका अधिकांश हिस्सा नाइजीरिया में निवास करते हैं, जहां योरूबा देश की आबादी का 21% है.  वे बेनिन गणराज्य और टोगो के कुछ हिस्सों में भी निवास करते हैं. बता दें कि योरूबा सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में सबसे बड़े अफ्रीकी जातीय समूहों में से एक हैं. यह केवल एक समूह नहीं हैं, बल्कि एक आम भाषा, इतिहास और संस्कृति से बंधे विविध लोगों का एक संग्रह है.

योरूबा लोगों के दो प्रमुख समूह हैं. पहले समूह को हाल के प्रवासियों के रूप में जाना जाता है जो 1960 से 1980 के दशक में आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए थे. वहीं दूसरे समूह में योरूबा के वे लोग शामिल हैं जो अटलांटिक में गुलामों के खरीद-बिक्री का हिस्सा थे.

योरूबा आदिवासियों द्वारा शरीर पर निशान बनाने की प्रथा 200 सालों से चला आ रहा है. हालांकि अब यह प्रथा विलुप्ती के कगार पर है, लेकिन आज भी योरूबा के लोग इसे मानते देखे जाते हैं.

वर्ष 1885 से 1950 तक योरूबा के लोगों का बड़े पैमाने पर गुलामी के लिए व्यापार किया जाता था और योरूबा क्षेत्र को स्लेव कोस्ट यानी गुलाम तट के रूप में जाना जाता था. इस दौरान योरूबा के बड़े संख्या को अमेरिका ले जाया गया. कैरेबियन और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में योरूबा धर्म को ईसाई धर्म के साथ जोड़ दिया गया है. हालांकि उनके वंशजों ने योरूबा परंपराओं को अभी भी संरक्षित रखा है. वर्ष 1893 में नाइजीरिया में योरूबा साम्राज्य ग्रेट ब्रिटेन के संरक्षित क्षेत्र का हिस्सा बन गया. वर्ष 1960 तक नाइजीरिया एक ब्रिटिश उपनिवेश था और योरूबा अंग्रेजों के गुलाम थे.

ऐसा माना जाता है कि औपनिवेशिक युग के दौरान ही नाइजीरिया में आदिवासी निशान अस्तित्व में आए थे. कहा जाता है कि जब लोगों को पकड़कर गुलामी में ले जाया जा रहा था तब समाज के सदस्यों ने पहचान या मान्यता के लिए अपने परिवार के सदस्यों को अंक देना शुरू कर दिया. वे ऐसा इसलिए करने लगे, ताकि अगर उनके परिवार का कोई सदस्य को गुलामी के लिए पकड़ा जाए तो भविष्य में कभी दोबारा मिलने पर पहचाना जा सके.

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