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संताल जनवरी में क्यों मनाते हैं सोहराय पर्व, जानिए

Posted on January 14, 2023 - 6:08 pm by

संतालों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार सोहराई कहलाता है. यह त्यौहार मवेशियों के सम्मान में जनवरी माह में मनाया जाता है, जो कि मकर सक्रांति तक चलता है. यह समय संताल कलेंडर के अनुसार साल का आखरी दिन होता है. इसके बाद संताल नव वर्ष का आरंभ होता है.

दुमका के सच्चिदानंद सोरेन कहते हैं कि यह त्यौहार वास्तविक रूप से नवंबर के महिने में मनाया जाता है. लेकिन अंग्रेजो के विरूद्ध संताल हुल होने के कारण संताल परगना और कुछ इलाको में जनवरी में सोहराय का त्यौहार मनाने की परंपरा की शुरूआत हुई. इसका फसली त्यौहार से कोई लेना देना नहीं है.  

सोहराई रिचुअल

सोहराई के पहले दिन की शुरुआत ऊंम यानी स्नान करने से शुरु किया जाता है. इसके साथ पुजारी और अन्य लोग घर घर जाकर नाच गान करते हैं.

1. गोटंडी में पूजा किया जाता है. वहां अंडा रखा जाता है. बता दें कि गोटंडी ऐसा जगह होता है, जहां से मवेशियां आ जा सके. यह कोई स्थाई जगह नहीं होती है. उसी स्थान पर एक अंडा रखा जाता है और जो भी मवेशी अंडे से सम्पर्क करता है उसे लोग बहुत भाग्यवान समझते हैं.

2. गांवों में मवेशियों को जहां रखा जाता है, वहां पर मवेशियों को पूजा जाता है.

3. गांवों में घरों के बीच का स्थान या आंगन में बैलों को बांध कर उसके चारों ओर नृत्य किया जाता है.

ये तीन रिवाज बहुत महत्वपूर्ण होते हैं.

वर्तमान में मुख्यता सोहराई पर्व के अंतिम दिन को तिलसगरात (मकर संक्रांति) के साथ समाप्त किया जाता है क्योंकि उसे मनाने वालों की संख्या बढ़ गई है, जिससे सोहराई पर्व में तिलसगरात भी शामिल किया गया है. इसके तहत अंतिम दिन लोग बेझा पुंज करते हैं. जो कि अलग त्योहार है लेकिन अब इसमें शामिल किया गया है. इसमें एक केले के खंभे पर पकवान को लटकाया जाता है. उस पकवान को सभी ग्रामीण तीरे से निशाना साधते हैं. पकवान पर सही निशाना लगाने वाले व्यक्ति को ग्रामीण कंधे पर उठा कर घूमते हैं. ऐसे ही कई और प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है. इसके बाद केले के खंभे को तीन-चार भाग करते हैं. इन भागों को पुजारियों और मुख्य लोगों के घरों के छत पर लगाया जाता है.

उस दिन खिचड़ी तैयार करने के लिए हर परिवार आधा किलो चावल, एक युवा चिकन, नमक, हल्दी पाउडर, आलू, जलाऊ लकड़ी, दाल और आलू के साथ चावल का मिश्रण देता है. वे रानू का भी योगदान देते हैं, जो चावल की बीयर तैयार करने के लिए खमीर जैसा किण्वन कारक है. इस पहले दिन पुरुष उत्सव की शुरुआत करने के लिए गाँव के बाहर एक खेत में एक अनुष्ठान करते हैं.

नाइकी (गाँव के पुजारी) द्वारा किए गए अनुष्ठान के बाद पुरुष खिचड़ी खाते हैं और हड़िया (चावल की बीयर) एक साथ पीते हैं. गुडित (संदेशवाहक) बाद में बरगद के पेड़ के पत्तों पर बाकी खिचड़ी हर परिवार को वितरित करता है. दोपहर को जब गायें घर लौटती हैं तो गांव के रास्ते में एक अंडा दिया जाता है. अंडे पर मुहर लगाने वाली गाय या भैंस का मालिक गांव के आगामी माघ महोत्सव में चावल की बीयर का एक बर्तन भेंट करेगा.

संताल सोहराय कथा

ऊपर वाले देवी-देवता यानी ठाकुर और ठकुराइन ने हमें गाय–भैंस चास-वास करने के लिए दिया था ताकि इंसान इसके माध्यम से खेती कर सके साथ ही दूध का भी सेवन कर सके और बदले में इंसान सम्मान करे. लेकिन कलांतर में ऐसा देखा गया कि इंसानों ने मवेशियों का शोषण किया. खुद पूरा दूध पी तो लिया पर बछड़े को पीने नहीं दिया. इसके साथ जो मरांग बुरू है उनको भी भोग नहीं दिया.

इसके वजह से मवेशियों के पक्ष का प्रतिनिधि ऊपर जाकर शिकायत करता है. शिकायत के बाद ठाकुर निर्देश देता है कि जितने जानवर हैं उनको ऊपर ले आए. जिसके बाद ठकुराइन कहती हैं कि ये लोग भी हमलोग के ही प्राणी हैं इसलिए इन लोगों को ऊपर लेकर नहीं आए.

उस वक्त हमलोग के मरांग बुरू धरती पर ही रहते थे. ठकुराइन उनसे कहतीं हैं कि वो इंसानों को जाकर बताए और समझाएंगे कि उनका सम्मान करें उन्हें मारे पीटे नहीं बल्कि उनके साथ प्रेम पूर्वक रहें. अगर ऐसा नहीं करते हैं तो इंसानों के पास से सभी जानवरों को ऊपर ले जाया जाएगा. मरांग बुरू ने ठाकुर-ठकुराइन के आदेश का पालन किया. जिसके बाद देखा गया कि इंसान जानवरों को सम्मान देने लगे और प्रेमपूर्वक रहने लगे और ठाकुर ठकुराइन ने जानवरों को ऊपर नहीं बुलाया. इसके बाद से ही जानवरों के सम्मान में सोहराय का त्यौहार मनाया जाने लगा.

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