Skip to main content

महाराष्ट्र: मिलेट्स के संरक्षण को लेकर यह आदिवासी किसान क्यों हो रहा है फेमस

Posted on April 5, 2023 - 2:59 pm by

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोले तालुका के जागीरगारवाड़ी गांव में एक आदिवासी किसान भालूभाऊ किसान घोड़े पांच एकड़ में सात प्रकार के मिलेट्स उगाते हैं. मिलेट्स के विभिन्न किस्मों को इकट्ठा करने के लिए कई क्षेत्रों में यात्रा कर चुके हैं. उनका जीवन ही मिलेट्स को समर्पित है.

साल 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. जिससे मिलेट्स को लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगा.

भालूभाऊ को मिलेट्स के बारें में तब पता चला, जब उन्होंने 14 साल की आयु में खेती शुरू की. स समय तक मिलेट्स गांव से लगभग गायब ही हो गया था. उसकी जगह पर धान उगाया जा रहा था.

मानसून के दिनों में भालूभाऊ के पिता जानवरों को मड़ुआ या रागी(Finger millet) खिलाया करते थे. इसके अलवा मजदूर मानसून के दिनों बारिश और कीचड़ में काम करने के लिए इसको खाना के रूप में खाते थे. मड़ुआ ने पशुओं और मजदूरों दोनों को स्वस्थ रखा, जिससे उन्होंने इस मड़ुआ पर शोध किया.

मड़ुआ के अलावा वरई को आदिवासियों के द्वारा खाया जाता था. वह अब इनकी खेती करना चाहता था. इसके लिए उन्हें बीजों और उगाने की तकनीक की आवश्यकता थी. उन्होंन गांव के किसानों को संरक्षण करने के लिए कहा. भालुभाऊ अब शहर के लोगों को गेंहू के बजाए, मड़ुआ की रोटी परोसने का फैसला किया. मडुआ एक फसल के रूप में बाजरा, उच्च नस्ल के उच्च उपज वाले धान की तुलना में अधिक मजबूत है.

मौखिक प्रचार सबसे अच्छा प्रचार है और पिछले कई वर्षों में बाजरा की मांग में वृद्धि देखी है. उनके प्रयासों की बदौलत, गाँव के लगभग 30 प्रतिशत किसान अब अपनी जोत का एक हिस्सा बाजरा उगाने के लिए समर्पित करते हैं. यही कारण है कि भालुभाई मिलेट्स की खोज में कई जगहों पर गए. जो कि अब विलुप्त की कगार पर है.

उसे पता चला कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने मशीनीकरण और मूल्यवर्धन के साथ बाजरा के संरक्षण में बेहतर काम किया है. यह तमिलनाडु से था कि उन्होंने छोटे बाजरे को परिवर्तित करने के लिए पहली आटा चक्की प्राप्त की.

घोडे का घर में अब मिलेट्स के कई किस्म है. अकेले उनके प्रयासों ने उन्हें 20 अलग-अलग किस्मों के रागी, दस अलग-अलग प्रकार के छोटे बाजरा, तीन अलग-अलग प्रकार के फॉक्स टेल बाजरा और एक-एक ब्राउन टॉप, बार्नयार्ड और कोडू बाजरा इकट्ठा करने में मदद मिली.

बाजरा और ज्वार के मामले में उनके पास देशी किस्में हैं, जो अब नहीं मिलती है.

घोडे ने कई प्रदर्शनियों के साथ-साथ हैदराबाद में आईसीएआर के बाजरा अनुसंधान संस्थान में एक संसाधन व्यक्ति के रूप में काम किया है.

राज्य में भालूभाई घोडे को चैंपियन किसान के रूप में जाना जा रहा है, जिसका उदाहरण अन्य किसानों को दिया जाता है.

(IMAGE: TIE)

No Comments yet!

Your Email address will not be published.