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छत्तीसगढ़: क्या अब बचेगा हसदेव अरण्य?  राज्य ने केंद्र को पत्र लिखकर उठाई ये मांग

Posted on November 2, 2022 - 12:02 pm by

छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य  को बचाने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा है. लागातार विरोध के बाद आवंटन को निरस्त करने की मांग की गई है. आंदोलन कर रहे ग्रामीण आदिवासी के लिए यह बड़ी राहत की खबर है. इसके लिए वन विभाग ने सोमवार को पत्र लिखकर खदान के लिए दी गई वन भूमि के डायवर्शन की अनुमति को निरस्त करने का आग्रह किया है.

वन विभाग ने केंद्र सरकार को लिखा पत्र

दरअसल हसदेव अरण्य को बचाने के लिए सालभर से आदिवासियों का आंदोलन चल रहा है. ग्रामीण आदिवासी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसको ध्यान में रखते हुए वन विभाग के अवर सचिव केपी राजपूत ने सोमवार को केंद्रीय वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में वन महानिरीक्षक को पत्र लिखा है. पत्र में कहा गया है कि हसदेव अरण्य कोल फील्ड में व्यापक जनविरोध के कारण कानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति पैदा हो गई है. ऐसे में जन विरोध,  कानून व्यवस्था और व्यापक लोकहित को ध्यान में रखते हुए 842 हेक्टेयर की परसा खुली खदान परियोजना के लिए जारी वन भूमि डायवर्शन स्वीकृति को निरस्त करने का कष्ट करें.

वन विभाग द्वारा भेजी गई चिठ्ठी

आदिवासियों ने 300 किलोमीटर की पदयात्रा की थी

परसा कोयला खदान से प्रभावित फतेहपुर, साल्ही और हरिहरपुर, घाटबर्रा जैसे कई गांव हसदेव अरण्य में कोयला खदान का विरोध कर रहे हैं. पिछले साल हसदेव अरण्य को बचाने के लिए आदिवासियों ने 300 किलोमीटर की पदयात्रा कर राज्यपाल और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिले थे. वहीं इसके बाद हसदेव अरण्य को बचाने के लिए राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी एक अशासकीय संकल्प का समर्थन किया था. इसमें केंद्र सरकार से कोयला खदान आवंटन को निरस्त करने की मांग की गई थी.

कार्यकर्ताओं ने सरकार के इस पहल पर क्या कहा

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के सदस्य आलोक शुक्ला ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है. उन्होंने अपने ट्वीटर पर लिखा है कि कम से कम व्यापक जन विरोध को (सरकार ने) स्वीकार्य तो किया इस पत्र को लिखे जाने का भी स्वागत. आगे कहा कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास वन स्वीकृति को निरस्त करने का बराबर का अधिकार है. शुक्ला ने कहा कि वन संरक्षण कानून की धारा 2 के तहत वन स्वीकृति का अंतिम आदेश राज्य का वन विभाग जारी करता है. जिसे वह कभी भी वापिस ले सकता है. बस्तर की 13 नं. खदान की अंतिम वन स्वीकृति को निरस्त किया गया है.

वहीं भारत की पर्यावरण कार्यकर्ता लिसीप्रिया कंगुजाम ने कहा कि हां, हमारी आवाज काम करती है. छत्तीसगढ़ सरकार ने हमारे आंदोलन के बाद हसदेव वन में चल रहे कोयला खनन की वन मंजूरी को रद्द करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा है.

स्थानीय पत्रकार आलोक पुतुल ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में लगातार चल रहे आंदोलन के बाद अडानी के MDO  वाले दो नय़े कोयला खदानों में से एक परसा खदान की वन स्वीकृत रद्द करने के लिए केंद्र सरकार को चिटठी लिखी है. दिलचस्प है कि वन स्वीकृति रद्द करने का काम राज्य सरकार खुद कर सकती है.

आंदोलनकारियों को चिठ्ठियों पर भरोसा नहीं

आंदोलनकारियों का कहना है कि यह आंदोलन चलता रहेगा, उन्हें इन चिठ्ठियों पर भरोसा नहीं है. यह आंदोलन पिछले 20 सालों से चल रही है.

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